दक्षिण का द्वार और एक श्रापित साया (The Gateway to Deccan & The Cursed Shadow)
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में सतपुड़ा की पहाड़ियों पर स्थित 'असीरगढ़ का किला' (Asirgarh Fort) अपने इतिहास से ज्यादा अपने 'रहस्य' के लिए जाना जाता है। इसे 'दक्षिण का प्रवेश द्वार' (Gateway to Deccan) भी कहा जाता है, क्योंकि प्राचीन समय में उत्तर से दक्षिण भारत जाने का यही एकमात्र रास्ता था। लेकिन जैसे ही सूरज ढलता है, इस किले की फिजाओं में एक अजीब सी खामोशी छा जाती है।
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गुप्तेश्वर महादेव और वो अदृश्य भक्त (Gupteshwar Mahadev & The Invisible Devotee)
किले के अंदर एक प्राचीन शिव मंदिर है—'गुप्तेश्वर महादेव मंदिर'। यहाँ की कहानी विज्ञान को भी चुनौती देती है। स्थानीय लोगों और पुजारियों का दावा है कि मंदिर के कपाट चाहे कितने भी बंद क्यों न हों, हर सुबह यहाँ शिवलिंग पर ताजे फूल और रोली चढ़ी हुई मिलती है।
कहा जाता है कि यह पूजा कोई इंसान नहीं, बल्कि महाभारत काल का अमर योद्धा 'अश्वत्थामा' करता है। भगवान कृष्ण के श्राप के कारण वह पिछले 5000 सालों से भटक रहा है।
क्या सच में किसी ने उन्हें देखा है? (Is He Really Seen?)
किले के आसपास के बुजुर्ग बताते हैं कि कभी-कभी रात के अंधेरे में एक बहुत लंबा साया दिखाई देता है, जिसके माथे से खून बह रहा होता है। कई बार राहगीरों से उसे हल्दी और तेल मांगते हुए सुना गया है ताकि वह अपने माथे के घाव की जलन कम कर सके।
MPPSC/UPSC के लिए ऐतिहासिक तथ्य (Historical Facts):
निर्माण: इस किले का निर्माण 10वीं शताब्दी में आसा अहीर (Ahir King) ने करवाया था।
अकबर की अंतिम विजय: 1601 ई. में अकबर ने इस किले को जीता था, जिसे उसकी 'अंतिम विजय' माना जाता है। इसे जीतने के लिए अकबर को 'सोने की चाबियों' (रिश्वत) का इस्तेमाल करना पड़ा था।
स्थान: बुरहानपुर (मध्य प्रदेश)।
निष्कर्ष (Conclusion)
असीरगढ़ का किला सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि आस्था और रहस्य का एक ऐसा संगम है जिसे आज तक कोई सुलझा नहीं पाया है। क्या सच में अश्वत्थामा आज भी मुक्ति की तलाश में यहाँ भटक रहे हैं? यह प्रश्न आज भी एक पहेली बना हुआ है।
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