नमस्ते दोस्तों!
कल रात काफी देर तक नींद नहीं आई। हाथ में मुंशी प्रेमचंद की 'गोदान' (Godan) थी। वैसे तो इसे स्कूल-कॉलेज में कई बार पढ़ा, लेकिन आज जब उम्र के इस पड़ाव पर इसे दोबारा खोला, तो लगा कि प्रेमचंद जी ने होरी के रूप में शायद मेरा, आपका या हमारे उन पूर्वजों का किस्सा लिखा है जिन्होंने तिल-तिल जलकर अपनी मर्यादा बचाई।
1. किसान की वो नन्हीं सी हसरत: एक गाय!
कहानी शुरू होती है बेलारी गांव के एक सीधे-सादे किसान होरी से। होरी कोई करोड़पति बनने का सपना नहीं देखता। उसकी बस एक ही तड़प है— "अपने घर के खूंटे पर एक पछाईं गाय बंधी हो।"
अंकल जी, आप याद करिए, हमारे गांव में भी तो यही होता था न? गाय सिर्फ दूध का जरिया नहीं, घर की लक्ष्मी और साख (Status) मानी जाती थी। होरी ने भी इसी साख के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी। उसने गाय खरीदी, लेकिन उसके अपने ही सगे भाई हीरा ने जलन के मारे उस गाय को जहर दे दिया। यहीं से होरी की बर्बादी का वो सिलसिला शुरू हुआ, जो उसकी मौत पर ही जाकर रुका।
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2. धनिया: संघर्ष की वो आग जो कभी नहीं बुझी
अगर इस उपन्यास में मेरा कोई सबसे पसंदीदा पात्र है, तो वो है धनिया। होरी की पत्नी। जहां होरी थोड़ा दब्बू और मर्यादावादी (Traditionalist) है, वहीं धनिया सच बोलने से नहीं डरती।
जब गांव के पंच और पटवारी होरी पर झूठा जुर्माना लगाते हैं, तो धनिया शेरनी की तरह दहाड़ती है। वह जानती है कि ये धर्म के ठेकेदार सिर्फ गरीबों का खून चूसना जानते हैं। प्रेमचंद ने धनिया के जरिए उस भारतीय नारी को दिखाया है, जो घर भी संभालती है और बाहर के अन्याय से लड़ना भी जानती है।
3. गोबर: पुरानी परंपराओं पर नई पीढ़ी की चोट
होरी का बेटा गोबर, आज के युवाओं की तरह है। उसे अपने पिता की 'जी-हुजूरी' पसंद नहीं। वह पूछता है— "बाबा, हम क्यों इन जमींदारों के सामने झुकें? क्यों हम भूखे रहकर दूसरों का पेट भरें?"
गोबर शहर भाग जाता है, पैसे कमाता है, लेकिन क्या वो अपने घर की खुशियां वापस ला पाता है? नहीं। प्रेमचंद ने यहाँ दिखाया है कि गांव और शहर के बीच की जो खाई है, वो कैसे परिवारों को तोड़ देती है। Godan Munshi Premchand emotional story blog में ये हिस्सा सबसे ज्यादा सोचने पर मजबूर करता है।
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4. राय साहब और शहर की दोगली राजनीति
एक तरफ होरी जैसे लोग हैं जो दो वक्त की रोटी को तरस रहे हैं, और दूसरी तरफ राय साहब (Zemindar) जैसे लोग हैं जो 'गांधीवाद' की बातें तो करते हैं, लेकिन मौका मिलते ही किसानों का लगान बढ़ा देते हैं।
प्रेमचंद ने इस उपन्यास में शहर के बुद्धिजीवियों (Intellectuals) और गांव के अनपढ़ किसानों के बीच के विरोधाभास को बहुत खूबसूरती से दिखाया है। मिस मालती और मिस्टर खन्ना जैसे पात्र दिखाते हैं कि अमीरों के लिए 'दुख' भी एक मनोरंजन की चीज है।
5. वो आखिरी मंजर: जब कलेजा मुंह को आ जाए
उपन्यास का अंत पढ़ते हुए मेरी आँखों से आंसू टपक गए। होरी, जो दिन-रात सड़कों पर पत्थर तोड़ता है, लू लग जाने से गिर पड़ता है। उसके पास दवा के लिए एक ढेला नहीं है।
अंतिम समय में जब पंडित दातादीन आते हैं और कहते हैं— "होरी जा रहा है, इसका 'गोदान' करवाओ," तब धनिया के पास क्या बचता है? सिर्फ वो बीस आने पैसे, जो उसने कड़ी मेहनत से बचाए थे। वो पैसे पंडित के हाथ में रखकर धनिया का वो संवाद— "महाराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा... यही इनका गोदान है,"— पूरे समाज के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
निष्कर्ष: हम क्या सीखें?
दोस्तों, 'गोदान' पढ़ना एक अनुभव है। यह हमें सिखाता है कि
- अंधविश्वास और झूठी मर्यादा इंसान को जीते जी मार देती है।
- मेहनत का फल अक्सर वो लोग खा जाते हैं जो सिर्फ 'धर्म' का चोला ओढ़े होते हैं।
- परिवार का साथ ही सबसे बड़ी पूंजी है।
Godan Munshi Premchand blog के माध्यम से मेरा मकसद सिर्फ कहानी सुनाना नहीं, बल्कि उस दर्द को महसूस कराना था जिसे प्रेमचंद जी ने 1936 में महसूस किया था।
धन्यवाद:
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