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गुरुवार, 19 मार्च 2026

1975 का आपातकाल: वो 21 महीने जब पूरा भारत एक जेल बन गया था | 1975 Emergency in India History in Hindi

1975 Emergency in India history in Hindi Indira Gandhi

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25 जून 1975 को भारत में आपातकाल (Emergency) क्यों लगा? इंदिरा गांधी का वो फैसला, जेपी आंदोलन, नसबंदी का खौफ और इलाहाबाद हाईकोर्ट का सच। जानिए आपातकाल का पूरा इतिहास, बिल्कुल आसान भाषा में।

​दोस्तों, आज़ाद भारत के इतिहास में यूं तो कई ऐसी तारीखें हैं जिन्हें हम गर्व से याद करते हैं, लेकिन कुछ तारीखें ऐसी भी हैं जो किसी डरावने सपने की तरह हमारे जहन में चिपकी हुई हैं। आज मैं आपको किताबों में रटे-रटाए ज्ञान से थोड़ा बाहर निकालकर, उस दौर में ले जाना चाहता हूँ जब भारत के लोकतंत्र ने अपनी आखिरी सांसें गिनना शुरू कर दिया था।

​जरा सोचकर देखिए... आप सुबह उठें और आपको पता चले कि अख़बारों में खबरें नहीं छपी हैं, रेडियो पर सिर्फ़ सरकार का गुणगान हो रहा है, अगर आपने सरकार के खिलाफ चाय की टपरी पर भी कुछ बोल दिया, तो पुलिस आपको बिना कोई कारण बताए उठाकर जेल में डाल देगी। और तो और, आपके मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) पूरी तरह से छीन लिए गए हैं।

​सुनने में यह किसी हॉलीवुड फिल्म या तानाशाही वाले देश की कहानी लगती है न? लेकिन दोस्तों, यह हमारे ही देश भारत की कहानी है। यह कहानी है 25 जून 1975 की रात की, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर 'आपातकाल' (Emergency) थोप दिया था।

​आज के इस आर्टिकल में हम एकदम गहराई से समझेंगे कि आखिर नौबत यहाँ तक कैसे पहुँची? वो कौन सी चिंगारी थी जिसने आपातकाल की आग लगाई? और उन 21 महीनों में आम जनता और विपक्ष ने क्या-क्या झेला? तो कुर्सी की पेटी बांध लीजिए, क्योंकि इतिहास का यह सफर बहुत ही उतार-चढ़ाव भरा होने वाला है।


भारतीय संविधान की प्रस्तावना :- Preamble off indian constitution

भूमिका: 1971 की जीत और इंदिरा गांधी का 'गूंगा गुड़िया' से 'आयरन लेडी' बनना

​इस कहानी की शुरुआत 1975 से नहीं, बल्कि 1971 से होती है। 1971 में भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह धूल चटाई थी और एक नए देश 'बांग्लादेश' का निर्माण करवाया था। इस युद्ध के बाद इंदिरा गांधी की लोकप्रियता आसमान छू रही थी। जो विपक्ष उन्हें कभी 'गूंगी गुड़िया' कहकर चिढ़ाता था, वही विपक्ष अब उन्हें 'दुर्गा' का अवतार कहने लगा था। 1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी ने "गरीबी हटाओ" का नारा दिया और उन्हें छप्पर फाड़कर बहुमत मिला।

​सब कुछ एकदम बढ़िया चल रहा था। लेकिन कहते हैं न कि राजनीति में हवा का रुख बदलते देर नहीं लगती। 1971 के युद्ध के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा था।

  • महंगाई चरम पर थी: अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं।
  • बेरोज़गारी और सूखा: देश में सूखा पड़ा हुआ था, अनाज की कमी थी और युवा बेरोज़गार घूम रहे थे।
  • हड़तालें: 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेलवे की सबसे बड़ी हड़ताल हुई, जिससे पूरे देश की रफ़्तार थम गई।

​जनता जिस इंदिरा गांधी को भगवान मान बैठी थी, अब उसी जनता का मोहभंग होने लगा था। लोगों को लगने लगा था कि "गरीबी हटाओ" सिर्फ एक चुनावी जुमला था।


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चिंगारी: गुजरात का 'नवनिर्माण आंदोलन' और बिहार का छात्र आंदोलन

​आपातकाल की पटकथा दिल्ली में नहीं, बल्कि गुजरात और बिहार के हॉस्टलों में लिखी गई थी।

1. गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन (1974):

जनवरी 1974 में गुजरात के एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने हॉस्टल के मेस की फीस में बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया। यह प्रदर्शन इतना उग्र हो गया कि इसने एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया। इसे नाम दिया गया 'नवनिर्माण आंदोलन'। छात्रों का गुस्सा तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के भ्रष्टाचार के खिलाफ था। हालत यह हो गई कि इंदिरा गांधी को गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा और अंततः चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा। यह पहली बार था जब आज़ाद भारत में जनता के दबाव में किसी चुनी हुई सरकार को गिरना पड़ा था।

2. जेपी आंदोलन (JP Movement):

गुजरात की इस आग की लपटें जल्द ही बिहार पहुँच गईं। मार्च 1974 में बिहार के छात्रों ने भी बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लेकिन छात्रों को एक ऐसे नेता की ज़रूरत थी जो पूरे देश को एक साथ जोड़ सके। तब उन्होंने आवाज़ दी उस समय के सबसे बड़े और निष्कलंक नेता— जयप्रकाश नारायण (जिन्हें दुनिया जेपी के नाम से जानती है) को।

​जेपी राजनीति से संन्यास ले चुके थे, लेकिन देश की हालत देखकर वे वापस मैदान में उतरे। उन्होंने एक ऐसा नारा दिया जिसने इंदिरा गांधी की कुर्सी हिला कर रख दी— "संपूर्ण क्रांति" (Total Revolution)

​दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में लाखों की भीड़ के सामने जेपी ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की वो मशहूर लाइनें पढ़ीं:

"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!"


​जेपी ने पुलिस और सेना के जवानों से भी कह दिया कि वे सरकार के अनैतिक और असंवैधानिक आदेशों को न मानें। सरकार की नज़र में यह सीधे-सीधे 'देशद्रोह' और बगावत थी।


मौलिक अधिकार पर विस्तृत चर्चा :- भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार


धमाका: इलाहाबाद हाईकोर्ट का वो ऐतिहासिक फैसला (12 जून 1975)

​एक तरफ सड़कों पर जेपी का आंदोलन आग उगल रहा था, तो दूसरी तरफ अदालतों में इंदिरा गांधी के खिलाफ एक बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी जा रही थी।

​1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से राज नारायण को हराया था। राज नारायण कोई आम नेता नहीं थे, वे अपनी धुन के पक्के थे। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर दी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी (अधिकारियों, पुलिस, मंच आदि) का दुरुपयोग किया है, जो कि 'Representation of the People Act' के तहत एक भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practice) है।

​सुनवाई शुरू हुई और आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार देश के प्रधानमंत्री को कोर्ट के कटघरे में आकर खड़ा होना पड़ा। इंदिरा गांधी को 5 घंटे तक कोर्ट में खड़े रहकर वकीलों के सवालों के जवाब देने पड़े।

12 जून 1975 का वो दिन:

movement during 1975 national emergency in India



इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने वो फैसला सुनाया जिसने पूरे देश में भूचाल ला दिया। जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाया।

फैसले में दो सबसे बड़ी बातें थीं:

  1. ​इंदिरा गांधी का रायबरेली से चुनाव रद्द कर दिया गया।
  2. ​अगले 6 सालों तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई।

​यानी अब इंदिरा गांधी न तो सांसद रहीं और न ही प्रधानमंत्री! यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की आज़ादी और हिम्मत का सबसे बड़ा सबूत था।

​इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने हाईकोर्ट के फैसले पर 'सशर्त स्टे' (Conditional Stay) लगा दिया। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री तो बनी रह सकती हैं, लेकिन वे संसद की कार्यवाही में न तो वोट डाल सकती हैं और न ही हिस्सा ले सकती हैं।

​विपक्ष ने इंदिरा गांधी से तुरंत इस्तीफे की मांग तेज कर दी। जेपी नारायण ने दिल्ली में डेरा डाल लिया। अब इंदिरा गांधी के पास दो ही रास्ते थे— या तो इस्तीफा दे दें, या फिर पूरे देश के सिस्टम को ही पलट दें। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।

25 जून 1975 की वो काली रात: दिल्ली में क्या-क्या हुआ?

​दोस्तों, 25 जून की रात भारत के लोकतंत्र के लिए 'अमावस' की रात थी। इंदिरा गांधी के सबसे करीबी और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने उन्हें 'आंतरिक आपातकाल' (Internal Emergency) लगाने की सलाह दी।

​उस समय हमारे संविधान के अनुच्छेद 352 (Article 352) के तहत देश में 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) के आधार पर आपातकाल लगाया जा सकता था।

रात के अंधेरे में रची गई साज़िश:

  • ​रात को इंदिरा गांधी राष्ट्रपति भवन पहुँचीं। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को आधी रात को जगाया गया और उनसे आपातकाल के कागज़ात पर हस्ताक्षर करवा लिए गए। (नियमों के अनुसार इसके लिए कैबिनेट की मंज़ूरी ज़रूरी थी, लेकिन कैबिनेट के मंत्रियों को अगली सुबह तक भनक ही नहीं थी कि देश में क्या हो गया है)।
  • ​जैसे ही राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हुए, रातों-रात दिल्ली के सभी बड़े अख़बारों (जैसे इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया) के दफ्तरों की बिजली काट दी गई, ताकि अगली सुबह कोई भी अख़बार न छप सके और जनता को खबर न लगे।
  • ​रात 2 बजे से ही पुलिस की गाड़ियां दौड़ने लगीं। 'ऑपरेशन क्रैकडाउन' शुरू हो गया। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चौधरी चरण सिंह जैसे विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को रात में ही सोते हुए बिस्तर से उठाकर जेल में ठूंस दिया गया।

26 जून की सुबह:

सुबह 8 बजे इंदिरा गांधी ऑल इंडिया रेडियो के स्टूडियो पहुँचीं और देश के नाम संदेश दिया:

"भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने की कोई आवश्यकता नहीं है।"


​लेकिन सच तो यह था कि आतंक की शुरुआत बस अभी हुई थी।

आपातकाल के वो 21 महीने: जनता ने क्या-क्या झेला?

​आपातकाल सिर्फ नेताओं के लिए नहीं, बल्कि आम जनता के लिए भी एक बुरा सपना बन गया था। आइये देखते हैं उन 21 महीनों में इस देश में क्या-क्या हुआ:

1. प्रेस पर सेंसरशिप (Freedom of Press Destroyed):

संविधान का अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की आज़ादी) सस्पेंड कर दिया गया। कोई भी अख़बार सरकार की इज़ाज़त के बिना कुछ नहीं छाप सकता था। जो अख़बार सरकार के खिलाफ लिखते थे, उनके संपादकों को जेल में डाल दिया गया। विरोध जताने के लिए 'इंडियन एक्सप्रेस' और 'स्टेट्समैन' जैसे अख़बारों ने अपने संपादकीय (Editorial) पेज को एकदम खाली (Blank) छोड़ना शुरू कर दिया।

मशहूर गायक किशोर कुमार ने जब सरकार के एक कार्यक्रम में गाने से मना कर दिया, तो ऑल इंडिया रेडियो पर उनके गानों पर बैन लगा दिया गया।

2. मीसा (MISA) और डीआईआर (DIR) का खौफ:

Maintenance of Internal Security Act (MISA) नामक कानून का जमकर दुरुपयोग हुआ। इस कानून के तहत पुलिस किसी भी इंसान को बिना कोई कारण बताए गिरफ्तार कर सकती थी और उसे कोर्ट में पेश करने की भी ज़रूरत नहीं थी। लाखों बेगुनाह युवाओं, पत्रकारों और छात्रों को महीनों तक जेल की कालकोठरी में सड़ाया गया।

3. संजय गांधी का '5 सूत्रीय कार्यक्रम' और नसबंदी का आतंक:

इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी, जिनके पास कोई संवैधानिक पद नहीं था, वो उस दौरान 'सुपर प्राइम मिनिस्टर' बन गए थे। उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के लिए जबरन नसबंदी (Forced Sterilization) का अभियान चलाया।

यह दौर इतना खौफनाक था कि पुलिस वाले गांवों में घुसकर जवान लड़कों, कुंवारे युवकों और यहाँ तक कि बुजुर्गों को भी पकड़-पकड़कर उनकी नसबंदी कर देते थे। सरकारी कर्मचारियों (जैसे टीचर, पटवारी) को टारगेट दिया गया था कि अगर वे इतने लोगों की नसबंदी नहीं करवाएंगे, तो उनकी सैलरी रोक दी जाएगी। लोगों ने डर के मारे खेतों में सोना शुरू कर दिया था।

4. तुर्कमान गेट विध्वंस:

दिल्ली के सुंदरीकरण के नाम पर संजय गांधी के आदेश पर पुरानी दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में गरीबों की बस्तियों पर बुलडोज़र चला दिए गए। जब लोगों ने विरोध किया, तो पुलिस ने गोलियां चला दीं, जिसमें कई लोग मारे गए।

संविधान के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़: 42वां संविधान संशोधन (1976)

​दोस्तों, अगर आप प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे MPPSC या UPSC) की तैयारी कर रहे हैं, तो यह पॉइंट आपके लिए सबसे ज़रूरी है।

​आपातकाल के दौरान जब सारा विपक्ष जेल में था, तब इंदिरा गांधी ने संसद में एक ऐसा बिल पास करवाया जिसने पूरे संविधान का हुलिया ही बदल दिया। इसे 42वां संविधान संशोधन (42nd Constitutional Amendment Act, 1976) कहा जाता है। इसे इतिहास में 'Mini Constitution' (लघु संविधान) भी कहा जाता है।

​इसके ज़रिए सरकार ने जो कुछ किया, वो लोकतंत्र के लिए खतरनाक था:

  • ​राष्ट्रपति को कैबिनेट की सलाह मानने के लिए 'बाध्य' (Bound) कर दिया गया।
  • ​लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल 5 साल से बढ़ाकर 6 साल कर दिया गया।
  • ​सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की 'Judicial Review' (न्यायिक समीक्षा) की शक्तियों को बहुत सीमित कर दिया गया।
  • ​संविधान की प्रस्तावना (Preamble) में तीन नए शब्द जोड़े गए— समाजवादी (Socialist), पंथनिरपेक्ष (Secular) और अखंडता (Integrity)।
  • ​नागरिकों के लिए 'मौलिक कर्तव्य' (Fundamental Duties) भी इसी संशोधन के ज़रिए जोड़े गए।

​कुल मिलाकर, इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य सारी शक्तियां प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में केंद्रित करना और न्यायपालिका को कमज़ोर करना था।


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आपातकाल का अंत: एक ऐतिहासिक भूल और 1977 का चुनाव

​18 महीने बीत चुके थे। जनवरी 1977 में इंदिरा गांधी को उनके खुफिया विभाग (IB) ने रिपोर्ट दी कि अगर अभी चुनाव करवाए जाएं, तो जनता उन्हें भारी बहुमत से जिता देगी। इंदिरा गांधी को लगा कि विपक्ष तो जेल में रहकर टूट चुका होगा और जनता उनके काम से खुश होगी।

​यही उनके जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी।

​उन्होंने चुनाव की घोषणा कर दी और सभी विपक्षी नेताओं को जेल से रिहा कर दिया। जेल से बाहर आते ही जेपी नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम जैसे नेताओं ने मिलकर एक नई पार्टी बनाई— 'जनता पार्टी'

​चुनाव का एक ही मुद्दा था— "लोकतंत्र बनाम तानाशाही"। जनता के अंदर जो नसबंदी और पुलिस के डंडे का गुस्सा पिछले 21 महीनों से खौलता हुआ पक रहा था, वो ईवीएम (उस समय बैलेट पेपर) पर जाकर फूटा।

नतीजे:

मार्च 1977 में चुनाव के नतीजे आए और आज़ाद भारत के इतिहास में एक भूचाल आ गया। कांग्रेस पार्टी बुरी तरह चुनाव हार गई। सबसे बड़ा झटका यह था कि खुद इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गईं और संजय गांधी भी अमेठी से हार गए।

​भारत की जनता ने साबित कर दिया कि वो चाहे कितनी भी गरीब या अनपढ़ क्यों न हो, लेकिन वो अपने 'वोट की ताकत' और अपनी 'आज़ादी' की कीमत जानती है। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में देश में पहली बार 'गैर-कांग्रेसी' सरकार बनी।

44वां संविधान संशोधन (1978): गलतियों को सुधारना

​मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने सत्ता में आते ही आपातकाल की ज्यादतियों की जांच के लिए 'शाह आयोग' (Shah Commission) का गठन किया।

​इसके बाद, 42वें संशोधन द्वारा संविधान में किए गए कचरे को साफ़ करने के लिए 44वां संविधान संशोधन (44th Amendment Act, 1978) लाया गया। इसके तहत कुछ ऐतिहासिक बदलाव हुए जो आज तक हमें बचाते आ रहे हैं:

  1. 'आंतरिक अशांति' शब्द को हटा दिया गया: अब देश में आपातकाल केवल 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) के आधार पर ही लगाया जा सकता है, महज़ विरोध प्रदर्शनों के आधार पर नहीं।
  2. कैबिनेट की लिखित सलाह: यह अनिवार्य कर दिया गया कि राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा तभी करेंगे जब कैबिनेट 'लिखित' में सलाह देगी। (ताकि कोई प्रधानमंत्री रातों-रात फैसला न ले सके)।
  3. मौलिक अधिकारों की सुरक्षा: यह सबसे महत्वपूर्ण बदलाव था। इसमें कहा गया कि आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 (अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) को किसी भी हालत में निलंबित (Suspend) नहीं किया जा सकता।
  4. ​लोकसभा का कार्यकाल वापस 6 साल से घटाकर 5 साल कर दिया गया।

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निष्कर्ष: हमें 1975 से क्या सीखना चाहिए?

​दोस्तों, 1975 का आपातकाल भारत के माथे पर लगा एक ऐसा कलंक है जो कभी नहीं मिट सकता। लेकिन साथ ही, यह हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा भी थी, जिससे हमारा देश कुंदन बनकर बाहर निकला।

​यह दौर हमें सिखाता है कि लोकतंत्र सिर्फ एक शब्द नहीं है, यह हमारी सांसों की तरह है। जब तक यह मौजूद है, हमें इसकी अहमियत समझ नहीं आती, लेकिन जब कोई इसे छीनने की कोशिश करता है, तब पता चलता है कि आज़ादी की कीमत क्या होती है।

​चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, अगर जनता सो रही है, अदालतें कमज़ोर हो गई हैं और मीडिया चाटुकारिता में लग गया है, तो किसी भी देश में 1975 दोबारा आते देर नहीं लगती। एक जागरूक नागरिक के तौर पर अपनी आंखें खुली रखना और सही सवाल पूछना हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है।

आपकी राय:

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज के दौर में मीडिया और संस्थानों की स्थिति देखकर आपको लगता है कि देश में एक 'अघोषित आपातकाल' (Undeclared Emergency) जैसी स्थिति है? या हमारा लोकतंत्र आज पहले से कहीं ज्यादा मज़बूत है?

​अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें। अगर आपको यह रिसर्च और यह जानकारी पसंद आई हो, तो इस पोस्ट को अपने दोस्तों के साथ, खासकर उन लोगों के साथ जो इतिहास और राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं, शेयर करना बिल्कुल न भूलें!

Q1. भारत में आपातकाल कब और किसने लगाया था?

Ans: भारत में आपातकाल (Emergency) 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा लगाया गया था।

Q2. 1975 में आपातकाल (Emergency) लगने का मुख्य कारण क्या था?

Ans: इसका मुख्य कारण 12 जून 1975 का इलाहाबाद हाईकोर्ट का वो फैसला था, जिसमें इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया गया था और उन पर 6 साल तक चुनाव लड़ने की रोक लगा दी गई थी। इसके अलावा जेपी आंदोलन का बढ़ता दबाव भी एक बड़ा कारण था।

Q3. भारत में आपातकाल कितने समय तक लागू रहा?

Ans: भारत में आपातकाल 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक, यानी कुल 21 महीनों तक लागू रहा था।

Q4. आपातकाल के दौरान कौन सा संविधान संशोधन लाया गया था?

Ans: आपातकाल के दौरान 1976 में 42वां संविधान संशोधन (42nd Amendment Act) लाया गया था, जिसे 'लघु संविधान' (Mini Constitution) भी कहा जाता है। इसमें प्रधानमंत्री की शक्तियों को बढ़ाया गया था।

Q5. आपातकाल के बाद भारत में किसकी सरकार बनी?

Ans: 1977 में आपातकाल हटने के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस की बुरी हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में 'जनता पार्टी' की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

जय हिंद! जय लोकतंत्र!

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