बुधवार, 16 सितंबर 2026

पृथ्वीराज रासो असली है या नकली? जानिए रासो काव्य परंपरा और प्रमाणिकता का पूरा सच

 

पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता और रासो काव्य परंपरा - UGC NET हिंदी नोट्स

नमस्ते साथियों! अगर आप UGC NET-JRF, असिस्टेंट प्रोफेसर या TGT-PGT हिंदी की तैयारी कर रहे हैं, तो आप जानते ही होंगे कि आदिकाल से अगर कोई एक टॉपिक परीक्षक का सबसे पसंदीदा है, तो वह है—रासो साहित्य और विशेषकर 'पृथ्वीराज रासो' की प्रामाणिकता का विवाद।

हर साल यहाँ से 2-3 सवाल सीधे पूछे जाते हैं। कभी आलोचकों के नाम पूछ लिए जाते हैं कि किसने इसे जाली ग्रंथ कहा, तो कभी इसके चारों संस्करणों और छंदों पर सवाल बन जाते हैं।

आज हम इस पूरे विवाद की ऐसी चीरफाड़ करेंगे कि इसके बाद आपको किसी भारी-भरकम किताब के पन्ने पलटने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। अपनी नोटबुक और पेन निकाल लीजिए और चलिए आसान भाषा में समझते हैं।

1. रासो शब्द की उत्पत्ति: किसने क्या माना?

रासो साहित्य को समझने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि यह 'रासो' शब्द आया कहाँ से? अलग-अलग विद्वानों ने अपनी-अपनी डफली और अपना-अपना राग अलापा है:

  • गार्सा द तासी: इनका मानना है कि यह शब्द 'राजसूय' यज्ञ से निकला है।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल: शुक्ल जी का सीधा मत है कि यह शब्द 'रसायन' से बना है। उन्होंने बीसलदेव रासो की पंक्ति का उदाहरण भी दिया—"संवत सहस बहत्तर जानि, नालह कवि निंदिसि रसायनि।"
  • डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी: इनका मत सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक और सर्वमान्य माना जाता है। इन्होंने कहा कि रासो शब्द संस्कृत के 'रासक' (एक छंद व काव्य भेद) से विकसित हुआ है।
  • नंददुलारे वाजपेयी: इनका मानना है कि यह शब्द 'रास' से बना है।
  • हरप्रसाद शास्त्री: इन्होंने इसका संबंध 'राजयश' से जोड़ा है।

2. पृथ्वीराज रासो: एक संक्षिप्त परिचय

चंदबरदाई द्वारा रचित 'पृथ्वीराज रासो' को हिंदी साहित्य का प्रथम महाकाव्य और चंदबरदाई को हिंदी का प्रथम महाकवि माना जाता है। 

"चंदबरदाई हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका पृथ्वीराज रासो हिंदी का प्रथम महाकाव्य है।"

— आचार्य रामचंद्र शुक्ल

  • इस महाकाव्य में दिल्ली और अजमेर के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जीवन, उनके युद्धों और संयोगिता के साथ उनके प्रेम का बहुत ही जीवंत और रोमांचक वर्णन मिलता है।
  • इस ग्रंथ की कुछ बुनियादी बातें जो परीक्षा में सीधी पूछी जाती हैं:
  • कुल समय (सर्ग/अध्याय): इसमें कुल 69 समय (सर्ग) हैं।
  • छंदों की संख्या: इसमें लगभग 68 प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ है।
  • छंदों का राजा: चंदबरदाई को 'छप्पय छंद का विशेषज्ञ' माना जाता है। शिवसिंह सेंगर ने तो इन्हें 'छप्पय का राजा' तक कह दिया था।
  • ग्रंथ का समापन: चंदबरदाई जब पृथ्वीराज के साथ गजनी गए, तो उन्होंने इस पुस्तक को अधूरा छोड़ दिया था। उनके पुत्र जल्हण ने इसे पूरा किया। इसके लिए प्रसिद्ध पंक्ति है:
    • "पुस्तक जल्हण हत्थ दै, चलि गज्जन नृपकाज।"

3. सबसे बड़ा विवाद: क्या पृथ्वीराज रासो जाली ग्रंथ है?

अब आते हैं उस सबसे बड़े मुद्दे पर जिसने 100 सालों से हिंदी साहित्य के विद्वानों को आपस में उलझा रखा है।

साल 1875 में डॉ. वूलर को कश्मीर में 'पृथ्वीराज विजय' नाम का एक संस्कृत ग्रंथ मिला, जिसके लेखक जयानक थे। जब वूलर ने पृथ्वीराज विजय की ऐतिहासिक तिथियों का मिलान चंदबरदाई के रासो से किया, तो दोनों में जमीन-आसमान का अंतर निकला। वूलर ने तुरंत घोषणा कर दी कि पृथ्वीराज रासो एक जाली और अप्रमाणिक रचना है और एशियाटिक सोसाइटी को इसका प्रकाशन रोकने की सिफारिश कर दी।

बस, यहीं से विद्वान तीन गुटों में बंट गए। परीक्षा के लिए यह वर्गीकरण सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है:

(क) सर्वथा अप्रमाणिक मानने वाले विद्वान (जो इसे जाली मानते हैं):

इन विद्वानों का कहना है कि इसमें दी गई ऐतिहासिक तिथियाँ, वंशावलियाँ और घटनाएँ इतिहास से बिल्कुल मेल नहीं खातीं।

  • डॉ. वूलर (विवाद शुरू करने वाले)
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल
  • कविराज श्यामलदास (इन्होंने 'वीर विनोद' में इसे जाली सिद्ध किया)
  • गौरीशंकर हीराचंद ओझा
  • मुंशी देवीप्रसाद (इन्होंने चंदबरदाई को 'पिथल' और ग्रंथ को फर्जी बताया)

साथियों, जब मैंने पहली बार रामचंद्र शुक्ल का इतिहास पढ़ा था, तो मुझे सबसे बड़ा झटका यही लगा था कि उन्होंने इतने बड़े महाकाव्य को जाली क्यों कह दिया.... 

"यह पूरा ग्रंथ वास्तव में जाली है। इसमें न तो ऐतिहासिक तथ्य मिलते हैं और न ही भाषा उस समय की है।"

— आचार्य रामचंद्र शुक्ल


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(ख) सर्वथा प्रमाणिक मानने वाले विद्वान (जो इसे 100% असली मानते हैं):

इनका तर्क है कि यह कोई इतिहास की किताब नहीं बल्कि एक वीरगाथात्मक महाकाव्य है, इसलिए इसमें कल्पना की थोड़ी छूट स्वाभाविक है।

  • मिश्रबंधु (गणेशबिहारी, श्यामबिहारी, शुकदेवबिहारी)
  • कर्नल जेम्स टॉड (इन्होंने इसके कई अंशों का अंग्रेजी अनुवाद किया)
  • मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या
  • श्यामसुंदर दास
  • जॉर्ज ग्रियर्सन

विशेष तथ्य (Point to Remember): मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ने रासो की तिथियों की गड़बड़ी को सही ठहराने के लिए एक नए 'आनंद संवत' की कल्पना की और कहा कि रासो की तिथियाँ विक्रम संवत से 90-91 वर्ष पीछे चलती हैं।

(ग) अर्ध-प्रमाणिक मानने वाले विद्वान (सबसे संतुलित दृष्टिकोण):

आज का आधुनिक साहित्य जगत इसी मत को सबसे सही मानता है। इन विद्वानों का कहना है कि मूल रासो चंदबरदाई ने ही लिखा था, लेकिन समय के साथ-साथ बाद के भाटों और चारणों ने इसमें अपनी तरफ से बहुत सारा मनगढ़ंत अंश (प्रक्षिप्त अंश) जोड़ दिया।

  • डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी
  • डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी
  • मुनि जिनविजय
  • डॉ. दशरथ शर्मा

"पृथ्वीराज रासो की रचना शुक-शुकी संवाद के रूप में हुई थी। जिन अंशों में यह संवाद मिलता है, वे ही मूल और प्रमाणिक हैं, बाकी सब बाद में जोड़ा गया प्रक्षिप्त अंश है।"

— डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी

4. पृथ्वीराज रासो के 4 प्रमुख संस्करण (Quick Revision Table)

संस्करण (रूपांतरण) पदों/छंदों की संख्या प्रकाशन / प्राप्ति स्थल विशेष टिप्पणी
1. वृहद् रूपांतर (सबसे बड़ा) 16,306 छंद (69 समय) नागरी प्रचारिणी सभा, काशी यही संस्करण सबसे अधिक प्रचलित और विवादित है।
2. मध्यम रूपांतर लगभग 7,000 छंद अबोहर और बीकानेर यह अभी तक अप्रकाशित है।
3. लघु रूपांतर लगभग 3,500 छंद (19 समय) बीकानेर के अनूप संस्कृत पुस्तकालय इसमें प्रक्षिप्त अंश काफी कम हैं।
4. लघुतम रूपांतर (सबसे छोटा) केवल 1,300 छंद डॉ. दशरथ शर्मा द्वारा खोजा गया माताप्रसाद गुप्त और अगरचंद नाहटा इसे मूल मानते हैं।

📚 विगत वर्षों के महत्वपूर्ण प्रश्न (PYQ Practice):- 

अब देखते हैं कि यूथ कॉम्पिटिशन वाली किताब में इस टॉपिक से पिछले सालों में कौन-से सवाल सबसे ज़्यादा रिपीट हुए हैं....

प्रश्न 1. 'पृथ्वीराज रासो' को सर्वथा अप्रमाणिक और जाली ग्रंथ मानने वाले प्रमुख विद्वान कौन हैं? [UGC NET 2019, UPHESC 2021]

(A) मिश्रबंधु और कर्नल टॉड
(B) आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ. वूलर
(C) डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी और मुनि जिनविजय
(D) मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या और श्यामसुंदर दास

उत्तर: (B)
व्याख्या: डॉ. वूलर ने 1875 में 'पृथ्वीराज विजय' के आधार पर इसे जाली घोषित किया था। रामचंद्र शुक्ल, कविराज श्यामलदास और गौरीशंकर हीराचंद ओझा भी इसे पूर्णतः अप्रमाणिक मानते हैं।

प्रश्न 2. पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए 'आनंद संवत' की नई कल्पना किस विद्वान ने की थी? [UP PGT 2016, RPSC 2020]

(A) जॉर्ज ग्रियर्सन
(B) मुनि जिनविजय
(C) मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या
(D) दशरथ शर्मा

उत्तर: (C)
व्याख्या: मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ने रासो में आई ऐतिहासिक तिथियों की गड़बड़ी को दूर करने के लिए 'आनंद संवत' की स्थापना की थी, जो विक्रम संवत से 90-91 वर्ष का अंतर रखता है।

प्रश्न 3. "पृथ्वीराज रासो की रचना शुक-शुकी संवाद के रूप में हुई थी" – यह कथन किस आलोचक का है? [UGC NET Dec 2021]

(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) डॉ. रामकुमार वर्मा
(C) डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी
(D) डॉ. नगेंद्र

उत्तर: (C)
व्याख्या: डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसे अर्ध-प्रमाणिक मानते हुए कहा कि जिन अंशों में शुक-शुकी (तोता-मैना) का संवाद मिलता है, केवल वही मूल चंदबरदाई की रचना है।

निष्कर्ष (अंतिम शब्द)

साथियों, संक्षेप में याद रखने का सूत्र सीधा है:

  • वूलर, शुक्ल, ओझा :-  जाली (अप्रमाणिक)
  • टॉड, मिश्रबंधु, पंड्या :-  असली (प्रमाणिक)
  • द्विवेदी, चटर्जी, जिनविजय :- आधा सच, आधा मिलावट (अर्ध-प्रमाणिक)

इस एक पेज के नोट्स को अपनी डायरी में ज़रूर नोट कर लें। अगली पोस्ट में हम रासो साहित्य के अन्य प्रमुख ग्रंथ (बीसलदेव रासो, परमाल रासो यानी आल्हाखंड और हम्मीर रासो) पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

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