रविवार, 13 सितंबर 2026

आदिकाल का नामकरण: किस विद्वान ने क्या नाम दिया और क्यों? (UGC NET & Assistant Professor Special)


आदिकाल का नामकरण: विभिन्न विद्वानों के मत, तर्क और UGC NET JRF हिंदी साहित्य नोट्स


 नमस्ते प्यारे साथियों! कैसे हैं आप सब?

उम्मीद है आपकी परीक्षा की तैयारी पूरी लगन और सकारात्मक ऊर्जा के साथ चल रही होगी। जब भी हम हिंदी साहित्य के विशाल इतिहास को पढ़ना शुरू करते हैं, तो हमारे सामने सबसे पहला पड़ाव आता है—आदिकाल।

साहित्य का यह पहला कमरा जितना रहस्यमयी है, उतना ही दिलचस्प भी है। जब नए छात्र इसे पहली बार पढ़ते हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह आती है कि जितने बड़े इतिहासकार आए, उन्होंने इस काल के उतने ही अलग-अलग नाम रख दिए। कोई इसे 'चारण काल' कहता है, कोई 'वीरगाथा काल', कोई 'सिद्ध-सामंत युग', तो कोई 'बीजवपन काल'।

जब आप UGC NET, JRF, UPHESC, RPSC या किसी भी राज्य की असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षा का पेपर उठाकर देखेंगे, तो आपको इस अकेले टॉपिक से 2 से 3 प्रश्न सीधे-सीधे मिल जाएंगे। कभी-कभी यह प्रश्न 'कवि और नामकरण के सही मिलान' के रूप में आता है, तो कभी किसी आलोचक के प्रसिद्ध कथन के रूप में।

आज की इस ब्लॉग में हम इस पूरे नामकरण विवाद को इतनी सीधी, सरल और अपनी बोलचाल की भाषा में समझेंगे कि आपको कठिन परिभाषाओं को रटने का झंझट ही खत्म हो जाएगा। बस एक अच्छे छात्र की तरह अपनी नोटबुक और पेन साथ लेकर बैठिए, एक-एक बिंदु को दिल से समझिए और अपने नोट्स बनाते चलिए।

1. नामकरण की ज़रूरत और इसके पीछे का असली विवाद

सबसे पहले अपने मन से एक बुनियादी सवाल पूछिए: इतिहास में किसी कालखंड का नामकरण क्यों किया जाता है?

सीधा सा नियम है। जब समाज, राजनीति और साहित्य में कोई एक खास धारा या प्रवृत्ति (Trend) सबसे ज्यादा ताकतवर होकर उभरती है, तो इतिहासकार उसी प्रवृत्ति के आधार पर उस पूरे दौर का नाम रख देते हैं।

  • जैसे आगे चलकर जब समाज में ईश्वर की भक्ति और पदों की गूंज सबसे ज्यादा सुनाई दी, तो सबने मिलकर उसे भक्तिकाल कह दिया।
  • जब राजाओं के दरबारों में अलंकार, नायिका-भेद और लक्षण-ग्रंथों की बाढ़ आ गई, तो उसे रीतिकाल कह दिया गया।

लेकिन आदिकाल के साथ सबसे बड़ा पेंच यह फंसा कि यह किसी एक लीक पर चलने वाला युग नहीं था। यह भारत के इतिहास का वह दौर था जब पुरानी व्यवस्थाएं टूट रही थीं और नई व्यवस्थाएं जन्म ले रही थीं। इस दौर के साहित्य में एक साथ कई विरोधी धाराएं बह रही थीं:

  1. धार्मिक और साधनापरक धारा: एक तरफ सिद्ध और नाथ संप्रदाय के योगी अपनी अंतर्मुखी साधना, हठयोग और उलटबांसियों के पद जनता की बोली में सुना रहे थे।
  2. जैन आचार और नीतिपरक काव्य: गुजरात और राजस्थान के शांत वातावरण में जैन मुनि आचार, शांत रस और अहिंसा की सीख देने वाले सुंदर 'रास' ग्रंथ लिख रहे थे।
  3. दरबारी चारण काव्य (रासो साहित्य): राजपूत राजाओं के दरबारों में चारण और भाट कवि अपने राजाओं को खुश करने के लिए युद्धों और उनके शौर्य का ऐसा बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन कर रहे थे कि सुनते ही खून में उबाल आ जाए।
  4. लौकिक और मनोरंजक साहित्य: इसी दौर में जनसाधारण की भाषा में अमीर खुसरो अपनी पहेलियां और मुकरियां लिख रहे थे, तो दूसरी तरफ विद्यापति मैथिली में राधा और कृष्ण के प्रेम के मनमोहक पद रच रहे थे।

अब आप खुद एक निष्पक्ष निर्णायक बनकर सोचिए। जहाँ एक ही समय में शांत रस, भयानक रस, श्रृंगार रस और योग साधना साथ-साथ चल रहे हों, वहाँ किसी एक नाम पर सबकी सहमति कैसे बन सकती थी? यही कारण है कि आदिकाल का नामकरण हिंदी साहित्य के पूरे इतिहास का सबसे बड़ा वाद-विवाद का केंद्र बन गया।


👉 "यदि आप रासो साहित्य की ऐतिहासिकता और पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता को विस्तार से समझना चाहते हैं :- रासो साहित्य की संपूर्ण जानकारी 


2. प्रमुख इतिहासकारों के मत और उनके अकादमिक तर्क (गहन विश्लेषण)

आइए अब समय के क्रम के अनुसार एक-एक बड़े विद्वान के मत को खोलकर देखते हैं कि उन्होंने क्या नाम दिया, क्यों दिया और बाद में उनके नाम पर क्या आपत्तियां दर्ज की गईं।

(क) जॉर्ज ग्रियर्सन: 'चारण काल' (Charan Kaal)

हिंदी साहित्य के इतिहास को कालक्रमानुसार व्यवस्थित रूप से लिखने का सबसे पहला बड़ा प्रयास सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक 'The Modern Vernacular Literature of Hindustan' (1889 ई.) में किया था।

ग्रियर्सन साहब ने अपने पूरे ग्रंथ को 11 अलग-अलग अध्यायों में विभाजित किया। इसमें जो सबसे पहला अध्याय था, उसका नाम उन्होंने रखा—'चारण काल' (Charan Kaal)। उन्होंने इसकी समय सीमा 700 ईस्वी से 1300 ईस्वी तक मानी।

  • नामकरण का आधार: ग्रियर्सन का मानना था कि इस शुरुआती दौर का लगभग सारा साहित्य राजाओं के दरबार में रहने वाले चारण कवियों ने ही लिखा था, जिनका मुख्य पेशा अपने राजाओं की प्रशंसा करना था।

 

  • कमियां और तर्क: ग्रियर्सन ने नाम तो बहुत उत्साह में दे दिया, लेकिन जब उनसे 700 ईस्वी के आसपास के किसी प्रामाणिक चारण कवि या उनकी रचना का उदाहरण मांगा गया, तो वे कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण पेश नहीं कर पाए। उस समय का जो भी प्रामाणिक साहित्य मिला, वह सिद्धों और बौद्ध संतों का था, न कि चारणों का। इसलिए परवर्ती विद्वानों ने इस नाम को बहुत ही अधूरा और एकांगी मानकर खारिज कर दिया।

 

आदिकाल के अंतिम चरण में मैथिल कोकिल विद्यापति का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। शुक्ल जी के अनुसार उनके पदों में भक्ति प्रधान है या श्रृंगार? इसे विस्तार से समझने के लिए पढ़ें 👉  विद्यापति की पदावली: भक्ति भावना या विशुद्ध श्रृंगार? (संपूर्ण विश्लेषण)

 

(ख) मिश्रबंधु: 'प्रारंभिक काल' (Prarambhik Kaal)

मिश्रबंधु तीन सहोदर भाई थे—गणेशबिहारी मिश्र, श्यामकवि मिश्र और शुकदेवबिहारी मिश्र। इन्होंने मिलकर 'मिश्रबंधु विनोद' नाम का एक विशाल इतिहास ग्रंथ लिखा, जिसमें लगभग 5,000 कवियों का जीवन और उनका काम दर्ज किया गया।

मिश्रबंधुओं ने इस पहले कालखंड को 'प्रारंभिक काल' नाम दिया और इसे दो हिस्सों में बांटा:

  • पूर्वारंभिक काल: संवत् 700 से 1343 वि. (643 ई. से 1286 ई.)
  • उत्तरांरंभिक काल: संवत् 1344 से 1444 वि. (1287 ई. से 1387 ई.)
  • समीक्षा: मिश्रबंधुओं का काम साहित्य में कवियों का संकलन करने के लिए तो बहुत शानदार था, लेकिन 'प्रारंभिक काल' नाम किसी साहित्यिक चेतना या प्रवृत्ति को उजागर नहीं करता। यह नाम केवल यह बताता है कि यहाँ से शुरुआत हो रही है। यह वैसा ही है जैसे किसी बालक का नाम केवल 'शुरुआती बच्चा' रख दिया जाए। इसलिए यह नाम भी आलोचकों के गले नहीं उतरा।

(ग) आचार्य रामचंद्र शुक्ल: 'वीरगाथा काल' (Veergatha Kaal)

अब आते हैं हिंदी आलोचना के सबसे बड़े शिखर—आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर। शुक्ल जी का इतिहास लेखन पूरी तरह वैज्ञानिक और 'विधेयवादी पद्धति' (Taine's method) पर आधारित था।

शुक्ल जी का स्पष्ट मानना था कि किसी भी काल का नाम दो ठोस आधारों पर रखा जाना चाहिए:

  • उस काल में किस साहित्यिक प्रवृत्ति की सबसे अधिक रचनाएं मिलती हैं।
  • वे रचनाएं कितनी प्रामाणिक और प्रसिद्ध हैं।

शुक्ल जी ने संवत् 1050 से 1375 वि. (993 ई. से 1318 ई.) के समय को 'आदिकाल (वीरगाथा काल)' नाम दिया। उन्होंने अपने इस नामकरण को सिद्ध करने के लिए 12 खास पुस्तकों की सूची तैयार की:

अपभ्रंश की 4 पुस्तकें:

  1. विजयपाल रासो (नल्लसिंह)
  2. हम्मीर रासो (शांगधर)
  3. कीर्तिलता (विद्यापति)
  4. कीर्तिपताका (विद्यापति)

देशभाषा (लोकभाषा) की 8 पुस्तकें:

  1.  खुमान रासो (दलपति विजय)
  2.  बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह)
  3.  पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई)
  4.  जयचंद्र प्रकाश (भट्ट केदार)
  5. जयमयंक जस चंद्रिका (मधुकर कवि)
  6.  परमाल रासो / आल्हाखंड (जगनिक)
  7.  खुसरो की पहेलियाँ (अमीर खुसरो)
  8.  विद्यापति की पदावली (विद्यापति)

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मूल कथन:

"आदिकाल की इस दीर्घ परंपरा के बीच प्रथम डेढ़ सौ वर्षों के भीतर तो रचना की किसी विशेष प्रवृत्ति का निश्चय नहीं होता—धर्म, नीति, शृंगार, वीर सब प्रकार की रचनाएँ दोहों में मिलती हैं। इस अनिर्दिष्ट लोकप्रवृत्ति के उपरांत जब से मुसलमानों की चढ़ाइयों का आरंभ होता है, तब से हम हिंदी साहित्य की प्रवृत्ति एक विशेष रूप में बंधती हुई पाते हैं।"

(घ) शुक्ल जी के नामकरण पर उठे मुख्य आक्षेप

शुक्ल जी का विश्लेषण जितना जोरदार था, बाद के शोधकर्ताओं ने उसमें उतनी ही बुनियादी खामियां ढूंढ निकालीं:

  1. अप्रामाणिक रचनाएं: शुक्ल जी ने जिन 12 ग्रंथों का नाम गिनाया, उनमें से हम्मीर रासो, जयचंद्र प्रकाश और जयमयंक जस चंद्रिका की कोई मूल प्रति उपलब्ध ही नहीं थी। वे केवल नोटिस मात्र थीं।
  2. रस की विसंगति: बीसलदेव रासो को शुक्ल जी ने वीरगाथा माना, जबकि वह मूल रूप से एक कोमल श्रृंगारिक विरह काव्य है, जिसमें राजा बीसलदेव और रानी राजमती के प्रेम और अलगाव की कहानी है।
  3. कालक्रम की गड़बड़ी: खुमान रासो जिसे शुक्ल जी आदिकाल का मानते थे, उसमें चित्तौड़ के राजा राजसिंह (17वीं शताब्दी) तक का वर्णन मिलता है, जिससे सिद्ध हुआ कि यह बाद की रचना है।
  4. धार्मिक साहित्य की उपेक्षा: शुक्ल जी ने सिद्धों, नाथों और जैनियों के विशाल साहित्य को यह कहकर इतिहास से बाहर कर दिया कि यह मात्र 'धार्मिक उपदेश' है और शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आता।

(ङ) राहुल सांकृत्यायन: 'सिद्ध-सामंत युग' (Siddha-Samant Yug)

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भाषाशास्त्र और इतिहास की गहरी पड़ताल के बाद इस काल को 'सिद्ध-सामंत युग' (769 ई. से 1300 ई.) कहा। 

  • सिद्ध शब्द का अर्थ: 84 सिद्धों द्वारा रचा गया साधनापरक और रहस्यवादी साहित्य (राहुल जी ने 769 ई. के कवि सरहपा को हिंदी का पहला कवि माना)।
  • सामंत शब्द का अर्थ: उस दौर के सामंती राजाओं की युद्धप्रियता और उनकी प्रशंसा में रचे गए रासो काव्य।

समीक्षा: राहुल जी का यह नाम युग की दो सबसे बड़ी ताकतों को बहुत खूबसूरती से जोड़ता है। लेकिन इसकी सीमा यह रह गई कि इसमें नाथ साहित्य के हठयोग, जैन साहित्य के शांत रस और अमीर खुसरो के लोक-रंजक साहित्य के लिए कोई जगह नहीं बचती।


3. आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का सर्वमान्य मत: 'आदिकाल' (Aadi Kaal)

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के तर्कों का सबसे गहरा, प्रामाणिक और संतुलित उत्तर यदि किसी ने दिया, तो वे थे आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी।

द्विवेदी जी ने अपनी तीन प्रसिद्ध पुस्तकों—'हिंदी साहित्य की भूमिका', 'हिंदी साहित्य का आदिकाल' और 'हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास' में सिद्ध किया कि किसी भी काल को उसकी किसी एक संकीर्ण प्रवृत्ति के आधार पर बांधना साहित्य के साथ अन्याय है।

द्विवेदी जी ने शुक्ल जी के तर्कों को काटते हुए कुछ बेहद बुनियादी बातें सामने रखीं:

  1. धार्मिक साहित्य भी विशुद्ध साहित्य है: द्विवेदी जी ने स्पष्ट किया कि सिद्ध, नाथ और जैन मुनियों ने भले ही धर्म के संदर्भ में लिखा हो, लेकिन उनकी रचनाओं में तत्कालीन लोकजीवन, भाषा का वास्तविक रूप और गहरी मानवीय अनुभूतियाँ मौजूद हैं। अगर हम इसे बाहर निकाल देंगे, तो कबीर, जायसी और सूरदास का आधार ही गायब हो जाएगा।
  2. परंपरा का अटूट सातत्य: आदिकाल का साहित्य अचानक शून्य से पैदा नहीं हुआ था, बल्कि यह संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश की समृद्ध काव्य-परंपराओं का ही स्वाभाविक विकास था।
  3. व्यापक दृष्टिकोण: 'आदिकाल' शब्द किसी एक रस (जैसे वीर या श्रृंगार) का पक्ष नहीं लेता, बल्कि यह इस बात की ओर संकेत करता है कि यह हिंदी साहित्य का आरंभिक उन्मेष है, जिसमें आगे की सभी धाराओं के बीज मौजूद हैं।

आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का प्रसिद्ध कथन (Blockquote):

"वस्तुतः हिंदी का आदिकाल अत्यधिक विरोधों और व्याघातों का युग है। इस काल में परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ एक साथ सक्रिय दिखाई देती हैं।"

इसी कारण आधुनिक अकादमिक जगत, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों और प्रतियोगी परीक्षाओं में 'आदिकाल' नाम ही सबसे अधिक सटीक और सर्वमान्य माना जाता है।

4. अन्य प्रमुख विद्वानों के दृष्टिकोण (सीधे परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य)

विभिन्न आयोगों की परीक्षाओं में सीधे प्रश्न आते हैं कि अमुक विद्वान ने क्या नाम दिया। आइए इन सभी मतों को एक-एक पंक्ति में समझ लेते हैं:

  • डॉ. रामकुमार वर्मा: 'संधिकाल एवं चारण काल'
    • इन्होंने अपने ग्रंथ 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' में आदिकाल को दो भागों में बांटा—संधिकाल (750 से 1000 वि.सं.) और चारण काल (1000 से 1375 वि.सं.)। संधिकाल में इन्होंने अपभ्रंश की रचनाएं रखीं और भाषा की संधि दिखाई। इन्होंने जैन कवि स्वयंभू को हिंदी का पहला कवि माना।
  • आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी: 'बीजवपन काल'
    • द्विवेदी जी का तर्क था कि जिस प्रकार एक बीज के भीतर विशाल वृक्ष की सभी शाखाएं छिपी होती हैं, उसी प्रकार भक्ति, रीति और आधुनिक काल की प्रवृत्तियों के बीज इसी युग में बोए गए थे।
  • डॉ. धीरेंद्र वर्मा एवं डॉ. चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी': 'अपभ्रंश काल / पुरानी हिंदी का काल'
    • इन दोनों भाषाविदों का मानना था कि इस काल की भाषा पूरी तरह आधुनिक हिंदी नहीं बनी थी, बल्कि वह अपभ्रंश और अवहट्ठ के प्रभाव से युक्त पुरानी हिंदी थी।
  • पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र: 'वीर काल'
    • मिश्र जी ने शुक्ल जी की तरह वीर रस की प्रधानता को तो स्वीकार किया, लेकिन 'गाथा' शब्द को अनावश्यक मानकर इसे केवल 'वीर काल' कहा।
  • डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त: 'प्रारंभिक काल / उन्मेष काल'
    • इन्होंने अपने ग्रंथ 'हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास' में शालिभद्र सूरि (भरतेश्वर बाहुबली रास के रचयिता) को हिंदी का पहला कवि माना और इस काल को 'प्रारंभिक काल' कहा।
  • डॉ. मोहन अवस्थी एवं डॉ. सुमन राजे: 'आधार काल'
    • इन्होंने माना कि यह युग पूरे परवर्ती हिंदी साहित्य का बुनियादी आधार स्तंभ तैयार करता है।
  • डॉ. बच्चन सिंह: 'अपभ्रंश काल / जातीय साहित्य का उदय'
    • इन्होंने अपने 'हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास' में शुक्ल जी के वर्गीकरण से असहमति जताते हुए इसे अपभ्रंश काल कहा।
  • डॉ. वासुदेव सिंह: 'उद्भव काल'
  • शंभुनाथ सिंह: 'प्राचीन काल'
  • कमल कुलश्रेष्ठ: 'अंधकार काल'
  • हरीशचंद्र वर्मा: 'संक्रमण काल'

5. त्वरित पुनरावलोकन सारणी 

आपकी परीक्षा की त्वरित तैयारी के लिए पूरे नामकरण को एक जगह व्यवस्थित रूप से नीचे दिया गया है:

इतिहासकार / आलोचक प्रस्तावित नामकरण नामकरण का आधार / मुख्य बिंदु
जॉर्ज ग्रियर्सन चारण काल दरबारी चारण कवियों की रचनाओं को मुख्य माना।
मिश्रबंधु प्रारंभिक काल पूर्वारंभिक एवं उत्तरांरंभिक काल में विभाजन किया।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल वीरगाथा काल / आदिकाल 12 प्रमुख प्रामाणिक ग्रंथों की वीर रस प्रधान प्रवृत्ति।
राहुल सांकृत्यायन सिद्ध-सामंत युग 84 सिद्धों की साधना और सामंती राजाओं की स्तुति।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी बीजवपन काल भावी हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियों के अंकुरण का काल।
डॉ. रामकुमार वर्मा संधिकाल एवं चारण काल अपभ्रंश-हिंदी की संधि और चारण कवियों का काव्य।
आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी आदिकाल (सर्वमान्य नाम) परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों को समेटने वाला व्यापक नाम।
डॉ. धीरेंद्र वर्मा / गुलेरी जी अपभ्रंश काल / पुरानी हिंदी तत्कालीन भाषा संरचना और अपभ्रंश के प्रभाव पर आधारित।
पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र वीर काल वीर रस की प्रमुखता, 'गाथा' शब्द का विलोपन।
डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त प्रारंभिक काल / उन्मेष काल शालिभद्र सूरि को प्रथम कवि मानकर वैज्ञानिक विश्लेषण।
डॉ. सुमन राजे / मोहन अवस्थी आधार काल साहित्यिक चेतना के आधार निर्माण का समय।
6. निष्कर्ष: परीक्षा कक्ष के लिए अंतिम गुरु-मंत्र

प्यारे विद्यार्थियों, पूरी चर्चा का निचोड़ यह है कि नामकरण को लेकर विभिन्न इतिहासकारों में भले ही मतभेद रहे हों, लेकिन अंततः 'आदिकाल' नाम ही सर्वोपरि सिद्ध होता है।
आदिकाल नाम की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह किसी एक रचना या संप्रदाय के आधार पर बाकी धाराओं को बाहर नहीं करता। यह हमें समझाता है कि यह हिंदी जाति की चेतना का बाल्यकाल था, जहाँ ज्ञान, भक्ति, वीरता, प्रेम और श्रृंगार की धाराएं एक साथ मिलकर एक महान साहित्यिक भविष्य का निर्माण कर रही थीं।

7. Youth Competition Times Pattern: विगत वर्षों के हल प्रश्न (PYQs With Detailed Explanation)

📖 विगत वर्षों के हल प्रश्न (Youth Competition Times Pattern)

प्रश्न 1. आदिकाल को 'बीजवपन काल' नाम किस आचार्य ने दिया है? [UGC NET Dec 2014, UPHESC Assistant Professor 2016, KVS PGT 2018]

(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
(C) डॉ. रामकुमार वर्मा
(D) राहुल सांकृत्यायन

उत्तर: (B) आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

विस्तृत व्याख्या: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल को 'बीजवपन काल' कहा है क्योंकि उनका मत था कि आगामी भक्ति और रीतिकाल की साहित्यिक प्रवृत्तियों के बीज इसी युग में अंकुरित हुए थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे 'वीरगाथा काल', डॉ. रामकुमार वर्मा ने 'संधिकाल एवं चारण काल' तथा राहुल सांकृत्यायन ने 'सिद्ध-सामंत युग' कहा है।

प्रश्न 2. "आदिकाल अत्यधिक विरोधों और व्याघातों का युग है" - यह प्रसिद्ध कथन किस आलोचक का है? [UGC NET June 2019, RPSC Assistant Professor 2020]

(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) डॉ. नगेंद्र
(C) आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
(D) डॉ. रामविलास शर्मा

उत्तर: (C) आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी

विस्तृत व्याख्या: आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का आदिकाल' में शुक्ल जी के 'वीरगाथा काल' नामकरण की सीमाओं को रेखांकित करते हुए यह तर्क दिया था कि इस काल में सिद्ध, नाथ, जैन और चारण प्रवृत्तियाँ एक साथ सक्रिय थीं, अतः यह अत्यधिक विरोधों और व्याघातों का युग है।

प्रश्न 3. आदिकाल को 'आधार काल' की संज्ञा किस विद्वान ने दी है? [UP PGT Hindi 2015, MPPSC Assistant Professor 2018]

(A) डॉ. मोहन अवस्थी एवं डॉ. सुमन राजे
(B) डॉ. वासुदेव सिंह
(C) शंभुनाथ सिंह
(D) डॉ. बच्चन सिंह

उत्तर: (A) डॉ. मोहन अवस्थी एवं डॉ. सुमन राजे

विस्तृत व्याख्या: डॉ. मोहन अवस्थी ने अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का अद्यतन इतिहास' में तथा डॉ. सुमन राजे ने 'हिंदी साहित्य का आधा इतिहास' में आदिकाल को 'आधार काल' नाम दिया है। डॉ. वासुदेव सिंह ने इसे 'उद्भव काल' तथा डॉ. बच्चन सिंह ने 'अपभ्रंश काल / जातीय साहित्य का उदय' कहा है।

👉 "अगली कक्षा में हम विस्तार से पढ़ेंगे: [सिद्ध साहित्य और नाथ साहित्य: 84 सिद्ध, प्रमुख कवि और साधना पद्धति के सम्पूर्ण नोट्स]—पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।" :- शुद्ध एवं नाथ साहित्य की संपूर्ण जानकारी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Blogger द्वारा संचालित.

Translate