नमस्ते प्यारे साथियों! अगर आप UGC NET-JRF, असिस्टेंट प्रोफेसर या TGT-PGT हिंदी की तैयारी में लगे हैं, तो आपने एक बात ज़रूर नोटिस की होगी। जब भी परीक्षक को आदिकाल से गहरे, वैचारिक और थोड़े उलझाने वाले सवाल बनाने होते हैं, तो उसकी नज़र सीधे सिद्ध और नाथ साहित्य पर जाकर टिकती है।
अक्सर छात्र इसे केवल एक रटने वाला टॉपिक समझ लेते हैं—84 सिद्धों के नाम देख लिए, 9 नाथों की सूची रट ली और आगे बढ़ गए। लेकिन जब परीक्षा में रामचंद्र शुक्ल और हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के बयानों की तुलना पूछी जाती है, या संध्या भाषा और उलटबांसी के बीच का फर्क पूछा जाता है, तो वहाँ गलती हो जाती है।
आज हम इस पूरे विषय को एक कहानी की तरह समझेंगे। हम देखेंगे कि कैसे बौद्ध धर्म की विकृतियों से सिद्ध निकले, कैसे सिद्धों के वामाचार के विरोध में गोरखनाथ ने हठयोग का डंडा उठाया, और कैसे इन दोनों ने मिलकर आगे चलकर कबीर और पूरे भक्तिकाल की ज़मीन तैयार की। अपनी नोटबुक खोल लीजिए और एक-एक बात को दिल से समझते चलिए।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बौद्ध धर्म की शाखाओं से सिद्धों का निकलना
साथियों, किसी भी साहित्य को समझने से पहले उस समय के समाज को समझना बहुत ज़रूरी होता है। जब महात्मा बुद्ध ने अपना धर्म शुरू किया था, तब वह बहुत सीधा, नैतिक और आचरण प्रधान था। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ बौद्ध धर्म कई टुकड़ों में बंटने लगा:
- हीनयान और महायान: पहली शताब्दी आते-आते यह दो बड़ी धाराओं में बंटा।
- वज्रयान: आठवीं शताब्दी तक आते-आते महायान के भीतर से एक रहस्यमयी, तांत्रिक और मंत्र-प्रधान शाखा निकली, जिसे 'वज्रयान' कहा गया।
- सहजयान: इसी वज्रयान से आगे चलकर 'सहजयान' का जन्म हुआ।
वज्रयानियों का केंद्र मुख्य रूप से नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय और पूर्वी भारत (बिहार, बंगाल, ओडिशा, असम) था। इन तांत्रिक बौद्धों का मानना था कि कठोर तपस्या या घर-बार छोड़ने की ज़रूरत नहीं है। 'महासुख' (महान आनंद) की प्राप्ति तंत्र साधना, मंत्र, मुद्रा और मैथुन (स्त्री-संसर्ग) से भी हो सकती है।
इसी चिंतन धारा से जिन चमत्कारी योगियों और संतों का जन्म हुआ, उन्हें इतिहास में 'सिद्ध' कहा गया।
2. सिद्ध साहित्य: साधना पद्धति, प्रवृत्तियाँ और भाषा
सिद्धों की कुल संख्या 84 मानी गई है। इन 84 सिद्धों की सूची सबसे पहले ज्योतिरीश्वर ठाकुर के मैथिली ग्रंथ 'वर्ण रत्नाकर' में मिलती है। इसके बाद राहुल सांकृत्यायन ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'हिंदी काव्यधारा' में इनके जीवन और रचनाओं पर सबसे प्रामाणिक शोध प्रस्तुत किया।
सिद्धों की प्रमुख विशेषताएँ:
जाति-पांति और बाह्याचार का कड़ा विरोध: सिद्धों ने ब्राह्मणवादी कर्मकांड, वैदिक यज्ञ, तीर्थाटन और वर्ण-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाईं। उन्होंने कहा कि ईश्वर न मंदिर में है, न तीर्थ में, वह तो तुम्हारे अपने भीतर है।
- महासुखवाद (Mahasukhavada): साधना की चरम सीमा पर पहुँचकर जब साधक शून्य में लीन होता है, तो उसे जो परमानंद मिलता है, उसे इन्होंने 'महासुख' कहा। इसे संभोग सुख के सदृश माना गया।
- गुरु की सर्वोच्च महिमा: बिना गुरु के तंत्र का मार्ग नहीं मिल सकता। गुरु ही साधक को 'नाद' और 'बिंदु' का मिलन सिखाता है।
- स्त्री-साहचर्य: इनकी साधना में भैरवी (स्त्री संगिनी) का होना अनिवार्य माना गया, जो बाद में चलकर घोर विलासिता और पतन का कारण बना।
- अंतःसाधना पर ज़ोर: इन्होंने बाहरी दिखावे को पूरी तरह खारिज किया।
"पंडिअ सअल सत्त बक्खाणइ, देहहिं बुद्ध बसंत न जाणइ।
अमणागमणे ण तेन विखंडिअ, तोवि णिलज्ज भणइ हउँ पंडिअ।"
— सरहपा
(अर्थात: पंडित सभी शास्त्रों का बखान करते हैं, लेकिन अपनी ही देह में बसे बुद्ध को नहीं पहचानते। जन्म-मरण के चक्र को काट नहीं पाते, फिर भी बेशर्म होकर खुद को पंडित कहते हैं।)
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सिद्धों की 'संध्या भाषा' (Sandhya Bhasha)
सिद्धों की भाषा को हरप्रसाद शास्त्री और मुनि दत्त ने 'संध्या भाषा' या 'संधा भाषा' कहा है। इसका मतलब है—ऐसी भाषा जो शाम के धुंधलके जैसी हो; जिसमें आधा प्रकाश हो और आधा अंधेरा।
बाहर से देखने पर उसका अर्थ कुछ और दिखेगा, लेकिन जो उस साधना के रहस्य को जानता है, उसके लिए उसका गूढ़ आंतरिक अर्थ कुछ और होगा। इसी संध्या भाषा की प्रतीकात्मक शैली को आगे चलकर भक्तिकाल में कबीरदास ने 'उलटबांसी' के रूप में अपनाया।
3. प्रमुख सिद्ध कवि और उनकी रचनाएँ
यहाँ उन सिद्धों का विवरण है जिनसे परीक्षा में सीधे प्रश्न बनते हैं:
(क) सरहपा (सरहपाद)
- समय: आठवीं शताब्दी (769 ईस्वी, राहुल सांकृत्यायन के अनुसार)।
- उपनाम: इन्हें 'सरोजवज्र', 'राहुलभद्र' भी कहा जाता है। जाति से ये ब्राह्मण थे।
- हिंदी के प्रथम कवि: राहुल सांकृत्यायन ने सरहपा को हिंदी का पहला कवि स्वीकार किया है।
- प्रमुख रचना: 'दोहाकोश'।
इनकी रचनाओं में दोहा और चौपाई छंद की वह शैली मिलती है, जिसे आगे चलकर जायसी और तुलसीदास ने अपनी प्रबंध रचनाओं का आधार बनाया।
(ख) शबरपा
- समय: 780 ईस्वी के आसपास। ये सरहपा के शिष्य थे।
- उपनाम: शबरों (शिकारियों) की तरह जंगली वेशभूषा में रहने के कारण इनका नाम शबरपा पड़ा।
- प्रमुख रचनाएँ: 'चर्यापद' और 'महामुद्रावज्रगीति'।
नोट: चर्यापद एक प्रकार के गीत होते थे, जो विशेष अनुष्ठानों और साधना के समय गाए जाते थे।
(ग) लुइपा
- समय: 800 ईस्वी के आसपास। ये शबरपा के शिष्य थे।
- महत्व: 84 सिद्धों में लुइपा का स्थान साधना की दृष्टि से सबसे ऊंचा माना जाता है।
- ओडिशा के तत्कालीन राजा दारिकपा और उनके मंत्री इनके शिष्य बन गए थे।
(घ) डोम्भिपा
- समय: 840 ईस्वी के आसपास। मगध के क्षत्रिय वंश से थे।
- प्रमुख रचनाएँ: 'डोम्बी-गीतिका', 'योगचर्या', 'अक्षरद्विकोपदेश'।
(ङ) कण्हपा (कृष्णपाद)
- समय: 820 ईस्वी के आसपास। जालंधरपा के शिष्य थे।
- महत्व: सिद्धों में यह सबसे बड़े दार्शनिक और उच्च कोटि के कवि माने जाते हैं। इनके सबसे ज़्यादा (लगभग 74) ग्रंथ माने जाते हैं।
4. नाथ साहित्य: वामाचार का विरोध और हठयोग की प्रतिष्ठा
साथियों, अब कहानी में आता है एक नया मोड़। जब सिद्धों का सहजयान आगे बढ़ा, तो उसमें तंत्र-मंत्र, शराब और स्त्री-भोग की विकृतियाँ बहुत बढ़ गईं। धर्म के नाम पर समाज में अनैतिकता फैलने लगी।
तब पश्चिमी भारत (पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) से एक नई वैचारिक क्रांति की शुरुआत हुई, जिसे हम 'नाथ संप्रदाय' कहते हैं।
नाथों ने सिद्धों के भोगवादी मार्ग को एक झटके में खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर ईश्वर को पाना है, तो इंद्रियों का दमन करना होगा, भोग से नहीं बल्कि योग से मुक्ति मिलेगी।
नाथ संप्रदाय की प्रमुख विशेषताएँ:
- इंद्रिय-निग्रह और ब्रह्मचर्य: नाथों ने स्त्री-संग का कड़ा विरोध किया। गोरखनाथ ने साफ कहा कि साधना के मार्ग में कामिनी (स्त्री) सबसे बड़ी बाधा है।
- हठयोग की साधना (Hathayoga):
- 'ह' का अर्थ है सूर्य (पिंगला नाड़ी)।
- 'ठ' का अर्थ है चंद्र (इड़ा नाड़ी)।
- सूर्य और चंद्र के प्राणायाम द्वारा मिलन को, और कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करके सुषुम्ना नाड़ी के रास्ते 'सहस्रार चक्र' में पहुँचाने को हठयोग कहा गया।
- शून्यवाद और परम शिव: नाथों के आराध्य 'अलख निरंजन' (शिव) हैं, जो किसी मूर्ति या मंदिर में नहीं बंधे।
- गुरु गोरखनाथ का कड़ा अनुशासन: नाथ पंथ में ढोंग, पाखंड और विलासिता के लिए कोई जगह नहीं थी। यहाँ शारीरिक और मानसिक शुद्धि पर पूरा ज़ोर था।
"नौ लख पातरि आगै नाचै, पाछै सहज अनंता।
ऐसे रहि ले ग्यान कथीले, तत न छोडै संता॥"
— गुरु गोरखनाथ
9 नाथ कौन-से हैं?
गोरक्ष सिद्धांत संग्रह के अनुसार नौ नाथों के नाम इस प्रकार हैं:
- नागार्जुन
- जड़भरत
- हरिश्चंद्र
- सत्यनाथ
- भीमनाथ
- गोरक्षनाथ
- चर्पटनाथ
- जालंधरनाथ
- मलयार्जुन
(विशेष तथ्य: राहुल सांकृत्यायन ने जालंधरनाथ को सिद्धों और नाथों के बीच की कड़ी माना है।)
5. गुरु गोरखनाथ: नाथ साहित्य के वास्तविक संस्थापक
गोरखनाथ के गुरु का नाम मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) था। लोककथाओं में प्रसिद्ध है कि मछंदरनाथ स्वयं सिद्धों के प्रभाव में आकर काम-रूप (असम) की रानियों के भोग-विलास में फंस गए थे। तब उनके योग्य शिष्य गोरखनाथ ने वहाँ जाकर अपने गुरु को जगाया था और कहा था—"जाग मछंदर गोरख आया!"
गोरखनाथ का समय निर्धारण (विद्वानों के मत):
- राहुल सांकृत्यायन: 845 ईस्वी (9वीं सदी)।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल: 13वीं सदी (पृथ्वीराज चौहान के समकालीन)।
- डॉ. रामकुमार वर्मा: 13वीं सदी।
- डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल: 11वीं सदी (इन्होंने गोरखनाथ के 14 प्रामाणिक ग्रंथों का संपादन 'गोरखबानी' नाम से किया)।
- डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी: 10वीं सदी। (आज अधिकांश विद्वान द्विवेदी जी के मत को सबसे संतुलित मानते हैं।)
गोरखनाथ की प्रमुख रचनाएँ:
- शब्दी, पद, प्राण-संकली, शिष्यादर्शन, नर्वे बोध, आत्मबोध, अभय मात्रा जोग, पंद्रह तिथि, सप्तवार आदि। इनमें 'शब्दी' सबसे अधिक प्रामाणिक और प्रभावशाली मानी जाती है।
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6. आलोचकों के महत्वपूर्ण कथन: परीक्षा की दृष्टि से सबसे ज़रूरी
UGC NET की परीक्षा में पंक्तियाँ और कथन सीधे पूछे जाते हैं। इन्हें अपनी डायरी में अलग से नोट करें:
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत:
शुक्ल जी सिद्धों और नाथों की रचनाओं को शुद्ध साहित्य मानने से हिचकिचाते थे। उनका मानना था कि यह धार्मिक उपदेश मात्र हैं:
"सिद्धों और योगियों की रचनाएं तांत्रिक विधान, योग साधना और आत्म-निग्रह की बातें सिखाती हैं। वे जीवन की स्वाभाविक अनुभूतियों से दूर हैं, अतः उन्हें शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं रखा जा सकता। उन्हें केवल सांप्रदायिक शिक्षा मात्र समझना चाहिए।"
— आचार्य रामचंद्र शुक्ल
डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का कड़ा जवाब:
हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने शुक्ल जी के इस मत का बहुत तार्किक विरोध किया:
"यदि सांप्रदायिक होने मात्र से कोई रचना साहित्य की परिधि से बाहर हो जाएगी, तो फिर तुलसीदास का रामचरितमानस और कबीर की साखियाँ भी साहित्य से बाहर हो जाएंगी। सिद्धों और नाथों ने जिस साहित्य की नींव रखी, उसी पर कबीर का विशाल भवन खड़ा हुआ।"
— डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
"शंकराचार्य के बाद भारतवर्ष में इतना प्रभावशाली और महिमान्वित भारतवर्ष का कोई दूसरा नेता नहीं हुआ। गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े धार्मिक नेता थे।"
— डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
7. सिद्ध बनाम नाथ साहित्य: तुलनात्मक अध्ययन तालिका
नीचे दी गई तालिका को ध्यान से देखें। यह मोबाइल स्क्रीन पर साइड से कटेगी नहीं और पूरा अंतर एक नज़र में स्पष्ट कर देगी:
| बिंदु (आधार) | सिद्ध साहित्य | नाथ साहित्य |
|---|---|---|
| मूल उत्पत्ति | बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा से | शैव परंपरा और सिद्धों की प्रतिक्रिया से |
| संख्या और केंद्र | 84 सिद्ध (पूर्वी भारत: बिहार, बंगाल, असम) | 9 नाथ (पश्चिमी भारत: पंजाब, राजस्थान) |
| साधना का स्वरूप | प्रवृत्ति मार्ग, वामाचार, महासुखवाद (स्त्री-भोग) | निवृत्ति मार्ग, हठयोग, ब्रह्मचर्य (इंद्रिय-निग्रह) |
| स्त्री के प्रति दृष्टिकोण | साधना में संगिनी (भैरवी) के रूप में अनिवार्य | कड़ा विरोध, 'कामिनी' को साधना की बाधा माना |
| भाषा शैली | मागधी अपभ्रंश मिश्रित 'संध्या भाषा' | सधुक्कड़ी, राजस्थानी मिश्रित खड़ी बोली हिंदी |
| भक्तिकाल पर प्रभाव | कबीर की उलटबासियां और रहस्यवाद | संत काव्य की गुरु महिमा, निर्गुण पंथ, हठयोग |
8. हिन्दी साहित्य के विकास में इनका ऐतिहासिक योगदान
साथियों, अब सबसे मुख्य बिंदु पर बात करते हैं। अगर सिद्ध और नाथ न होते, तो हमारा हिंदी साहित्य आज जिस रूप में है, वैसा कभी न होता। इनके योगदान को हम इन 4 बिंदुओं में समझ सकते हैं:
संत काव्य (कबीर साहित्य) की पृष्ठभूमि तैयार करना:
कबीरदास जी के यहाँ जो आप पाखंड-खंडन, जाति-प्रथा पर चोट, और अंतःसाधना देखते हैं, वह सीधे-सीधे सरहपा की परंपरा से आता है। वहीं कबीर के यहाँ जो 'इड़ा-पिंगला', 'सुषुम्ना', 'अनहद नाद' और 'गगन मंडल' जैसे योग के शब्द हैं, वे पूरे के पूरे गोरखनाथ के हठयोग से लिए गए हैं।
छंद और काव्य रूपों का विकास:
सरहपा ने सबसे पहले दोहा और चौपाई को मिलाकर लिखने की जो शैली शुरू की, वही आगे चलकर सूफी प्रेमाख्यानों (मलिक मोहम्मद जायसी के 'पद्मावत') और रामभक्ति काव्य (तुलसीदास के 'रामचरितमानस') का मेरुदंड बनी।
खड़ी बोली और देशभाषा का आरंभिक स्वरूप:
जहाँ एक तरफ उस समय संस्कृत के भारी-भरकम दरबारी ग्रंथ लिखे जा रहे थे, वहीं सिद्धों और नाथों ने जनसाधारण की भाषा (अपभ्रंश, अवहट्ठ और पुरानी हिंदी) में साहित्य लिखा। गोरखनाथ की भाषा में हमें खड़ी बोली हिंदी का सबसे पहला सशक्त रूप देखने को मिलता है।
लोक-कल्याणकारी दृष्टि:
इन्होंने धर्म को राजाओं के महलों और मंदिरों के कपाटों से निकालकर आम जनता, जुलाहों, शिकारियों, मोचियों और सामान्य किसानों के बीच पहुँचाया। यह हिंदी साहित्य की पहली जनवादी चेतना थी।
9. Youth Publication पैटर्न: विगत वर्षों के हल प्रश्न (PYQs)
📚 Youth Competition Times: विगत वर्षों के महत्वपूर्ण प्रश्न (PYQ Bank)
प्रश्न 1. 'गोरखबानी' नामक पुस्तक में गोरखनाथ के ग्रंथों का संपादन किस विद्वान ने किया है? [UGC NET 2018, RPSC College Lecturer 2020]
(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल
(C) डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी
(D) राहुल सांकृत्यायन
सही उत्तर: (B)
व्याख्या: डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ के 14 प्रामाणिक ग्रंथों को खोजकर उनका संपादन 'गोरखबानी' शीर्षक से हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से प्रकाशित करवाया था।
प्रश्न 2. सिद्ध कवियों में साधना की दृष्टि से सर्वाधिक ऊंचा स्थान किसका माना जाता है? [UP PGT 2016, KVS PGT 2018]
(A) सरहपा
(B) शबरपा
(C) लुइपा
(D) डोम्भिपा
सही उत्तर: (C)
व्याख्या: 84 सिद्धों में लुइपा का स्थान साधना की दृष्टि से सबसे ऊंचा माना जाता है। ओडिशा के राजा और मंत्री इनके शिष्य बन गए थे, जबकि प्रथम कवि सरहपा हैं।
प्रश्न 3. "शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और इतना महिमान्वित भारतवर्ष में दूसरा नहीं हुआ।" गोरखनाथ के संदर्भ में यह प्रसिद्ध कथन किस आलोचक का है? [UGC NET June 2019, DSSSB 2021]
(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) डॉ. रामविलास शर्मा
(C) डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी
(D) डॉ. नगेंद्र
सही उत्तर: (C)
व्याख्या: डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का आदिकाल' और 'नाथ संप्रदाय' में गोरखनाथ के धार्मिक-सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन करते हुए यह कथन लिखा है।
प्रश्न 4. 'चर्यापद' मूल रूप से किस प्रकार की रचनाएं हैं? [UGC NET Dec 2022]
(A) दार्शनिक गद्य ग्रंथ
(B) बौद्ध अनुष्ठानों और साधना के समय गाए जाने वाले गीत
(C) युद्धकालीन वीरगाथात्मक प्रबंध काव्य
(D) व्याकरण और कोष ग्रंथ
सही उत्तर: (B)
व्याख्या: चर्यापद सिद्धों द्वारा तांत्रिक अनुष्ठान और साधना के समय गाए जाने वाले पद (गीत) हैं। इनकी रचना राग-रागिनियों पर आधारित है और इसमें संध्या भाषा का प्रयोग हुआ है।
प्रश्न 5. सिद्धों की 'संध्या भाषा' का सही अर्थ क्या है? [UPHESC Assistant Professor 2021]
(A) केवल शाम के समय बोली जाने वाली भाषा
(B) अंधकारमय और अस्पष्ट भाषा
(C) अंतःसाधनात्मक अनुभूतियों का संकेत करने वाली प्रतीकात्मक भाषा
(D) मगध क्षेत्र की ग्रामीण लोकबोली
सही उत्तर: (C)
व्याख्या: हरप्रसाद शास्त्री और विधुशेखर भट्टाचार्य के अनुसार, संध्या भाषा वह भाषा है जिसका एक बाह्य अर्थ होता है और एक गुप्त आंतरिक आध्यात्मिक अर्थ। इसी से उलटबांसियों का विकास हुआ।
निष्कर्ष (अंतिम शब्द)
साथियों, संक्षेप में अगर आपको याद रखना हो तो सिर्फ 3 सूत्र याद रखें:
- सिद्ध: 84 संख्या, पूर्व का केंद्र, वामाचार, महासुखवाद, संध्या भाषा, सरहपा (प्रथम कवि)।
- नाथ: 9 संख्या, पश्चिम का केंद्र, हठयोग, ब्रह्मचर्य, शून्यवाद, गोरखनाथ (मुख्य नेता)।
- भक्तिकाल: सिद्धों से कबीर का समाज-सुधार और उलटबांसी आई; नाथों से कबीर की गुरु-महिमा और योग साधना आई।
इस पूरे नोट्स को अपनी डायरी में व्यवस्थित रूप से लिख लें।

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