भक्तिकाल का उदय: स्वाभाविक विकास या इस्लामी आक्रमण की प्रतिक्रिया?
नमस्ते मेरे प्यारे साथियों!
अगर आप UGC NET-JRF, असिस्टेंट प्रोफेसर या किसी भी राज्य की प्रोफेसर परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो आपने एक चीज़ ज़रूर देखी होगी। जब भी परीक्षक का मन साहित्य के सबसे बुनियादी और गहरे वैचारिक सवाल पूछने का करता है, तो वह सीधे आदिकाल की सीमा लांघकर भक्तिकाल के दरवाज़े पर आकर खड़ा हो जाता है।
हर साल यहाँ से घुमा-फिराकर सवाल पूछे ही जाते हैं। कभी शुक्ल जी की वह मशहूर पंक्ति पूछ ली जाती है कि "अपने पौरुष से हताश जाति के लिए...", तो कभी हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का वह करारा जवाब आ जाता है कि "अगर इस्लाम न भी आया होता, तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता..."।
आज की इस क्लास में हम इस पूरे विवाद की ऐसी परतें खोलेंगे कि आपको किसी भारी-भरकम किताब के पन्नों में सिर खपाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। हम बहुत ही सहज, सीधी और बातचीत वाली भाषा में समझेंगे कि आखिर वह कौन सी सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक लहर थी, जिसने 14वीं सदी के भारत में अचानक 'भक्ति' का ऐसा सैलाब ला दिया जिसे जॉर्ज ग्रियर्सन ने 'बिजली की चमक' कह दिया था। अपनी डायरी और पेन निकाल लीजिए, एक-एक बात को दिल से समझिए।
1. भक्तिकाल के उदय की पहेली: आख़िर यह सवाल उठा ही क्यों?
साथियों, पहले ज़रा सोचिए। आदिकाल में क्या चल रहा था? चारों तरफ राजाओं की आपसी लड़ाइयाँ थीं, तलवारों की खनखनाहट थी, चारण कवि अपने आश्रयदाता राजाओं की झूठी प्रशंसा के पुल बांध रहे थे, और सुंदर राजकुमारियों के डोले लूटने के लिए युद्ध लड़े जा रहे थे। जीवन पूरी तरह से अशांत, अस्थिर और बाहरी चमक-दमक में उलझा हुआ था।
फिर अचानक 14वीं सदी आते-आते क्या जादू हो गया?
अचानक पूरे उत्तर भारत की फिज़ा बदल गई। तलवारों की झंकार की जगह कबीर की साखियों, सूरदास के पदों, तुलसीदास की चौपाइयों और जायसी की मसनवियों की गूंज सुनाई देने लगी। न कोई राजा का गुणगान कर रहा था, न किसी युद्ध की तैयारी हो रही थी। एक जुलाहा अपनी झोपड़ी में बैठकर 'राम' को पुकार रहा था, तो एक दृष्टिहीन कवि यमुना के किनारे बालकृष्ण की माखन चोरी के पद रच रहा था।
इस ज़बरदस्त सांस्कृतिक बदलाव को देखकर हर बड़े इतिहासकार के मन में यह सवाल उठा कि यह बदलाव आया कहाँ से? क्या यह किसी विदेशी आंधी का नतीजा था या हमारे अपने समाज के भीतर से फूटा कोई मीठा झरना था? बस, यहीं से शुरू हुई हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक बहस।
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2. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत: 'हिंदू जनता की निराशा और हताशा का सिद्धांत'
हिंदी आलोचना के पितामह कहे जाने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल जब अपना इतिहास लिख रहे थे, तो उनका ध्यान उस समय के राजनीतिक हालात पर सबसे पहले गया।
शुक्ल जी का मानना था कि 1192 के तराइन के दूसरे युद्ध के बाद उत्तर भारत में तुर्कों और मुगलों का स्थायी शासन कायम हो गया था। बड़े-बड़े हिंदू राजवंश ढह चुके थे। जो राजा कल तक अपने शौर्य का डंका पीटते थे, वे पराजित हो चुके थे। विशाल मंदिर तोड़े जा रहे थे, देवमूर्तियाँ खंडित की जा रही थीं और पूज्य विद्वानों और संतों का अपमान हो रहा था।
शुक्ल जी ने बहुत ही मनोवैज्ञानिक अंदाज़ में सोचा कि ऐसी हालत में एक पराजित समाज क्या करेगा? जब इंसान बाहर से पूरी तरह टूट जाता है, अपनी ताकत से लाचार हो जाता है, तो उसके पास केवल एक ही रास्ता बचता है—ईश्वर की शरण में सिर झुका देना।
"अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और दया की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?"
— आचार्य रामचंद्र शुक्ल
शुक्ल जी ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए आगे लिखा:
"मुसलमान अपने प्रभुत्व की प्रतिष्ठा के साथ ही देश में एक ओर तो अपने धर्म का प्रचार करना चाहते थे और दूसरी ओर हिंदुओं पर अत्याचार कर रहे थे। ऐसे समय में हिंदू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए कोई अवकाश न रह गया था। उसके सामने ही उसके देव-मंदिर गिराए जाते थे, देव-मूर्तियाँ तोड़ी जाती थीं और पूज्य पुरुषों का अपमान होता था और वे कुछ भी नहीं कर सकते थे। ऐसी दशा में अपनी वीरता के गीत न तो वे गा ही सकते थे और न बिना लज्जित हुए सुन ही सकते थे।"
— आचार्य रामचंद्र शुक्ल
शुक्ल जी के मत की तीन मुख्य बातें:
- राजनीतिक पराजय: विदेशी आक्रमणों के कारण समाज का आत्मविश्वास पूरी तरह टूट चुका था।
- मानसिक लाचारी: जब सांसारिक पौरुष काम नहीं आया, तो लोगों ने भगवान की दया का सहारा लिया।
- प्रतिक्रियावादी सिद्धांत: यानी भक्ति कोई स्वाभाविक साधना नहीं थी, बल्कि यह बाहरी संकट से बचने की एक लाचार प्रतिक्रिया (Reaction) थी।
3. बाबू गुलाब राय और डॉ. रामकुमार वर्मा का समर्थन
शुक्ल जी के इस हताशा वाले विचार को उस समय के कई अन्य विद्वानों ने भी थोड़ा अलग रंग देकर आगे बढ़ाया:
- बाबू गुलाब राय का मनोविज्ञान: गुलाब राय जी ने इसे विशुद्ध मनोवैज्ञानिक रूप में देखा। उन्होंने कहा कि जब किसी इंसान की सारी उम्मीदें और रास्ते बाहर से बंद हो जाते हैं, तो उसका मन अंदर की ओर मुड़ जाता है। पराजय और दुःख की इसी मनोवैज्ञानिक स्थिति ने लोगों को भक्ति की शांति की ओर धकेला।
- डॉ. रामकुमार वर्मा का दृष्टिकोण: रामकुमार वर्मा जी ने भी माना कि मुसलमानों के बढ़ते हुए राजनीतिक दबदबे ने हिंदुओं के राजनीतिक अस्तित्व को समाप्त कर दिया था। इस घोर अंधकार में अपनी मानसिक शांति को बनाए रखने के लिए ईश्वर की प्रार्थना ही एकमात्र सहारा बची थी।
4. डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का ऐतिहासिक हस्तक्षेप: 'परंपरा का स्वाभाविक विकास'
साथियों, अब आता है इस कहानी का सबसे बड़ा मोड़। यदि हज़ारीप्रसाद द्विवेदी मैदान में न आते, तो आज भी हम यही पढ़ते रहते कि हमारी भक्ति केवल एक हारी हुई, लाचार और रोती हुई कौम का रोना थी।
द्विवेदी जी ने शुक्ल जी के 'हताशा सिद्धांत' की एक-एक ईंट हिला दी। उन्होंने बहुत ही शांत लेकिन अकाट्य तर्कों के साथ एक सवाल पूछा:
"अगर भक्ति मुसलमानों के अत्याचार और पराजय की वजह से पैदा हुई थी, तो फिर भक्ति का आंदोलन सबसे पहले दक्षिण भारत में क्यों शुरू हुआ, जहाँ उस समय मुगलों या तुर्कों का कोई नामोनिशान भी नहीं था?"
जरा सोचिए, कितना ज़बरदस्त तर्क है यह!
दक्षिण भारत उस समय पूरी तरह सुरक्षित था, बड़े-बड़े हिंदू साम्राज्य फल-फूल रहे थे। अगर मुगलों के डर से भक्ति आनी थी, तो उसे सबसे पहले दिल्ली, लाहौर या पंजाब में आना चाहिए था, दक्षिण के तमिलनाडु और केरल में आलवार और नयनार संतों के यहाँ क्यों फूटी?
द्विवेदी जी ने साफ कहा कि भारतीय चिंतन धारा कभी मरी नहीं थी। उपनिषदों का ब्रह्म, गीता का निष्काम कर्म और भक्ति, बौद्धों की करुणा, सिद्धों की सहज साधना और नाथों का योग—यह सब मिलकर सदियों से हमारे खून में बह रहा था। 14वीं सदी में उसी प्राचीन भारतीय परंपरा ने अपनी नई करवट ली थी।
"लेकिन मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि अगर इस्लाम नहीं आया होता, तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।"
— डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
द्विवेदी जी ने शुक्ल जी की इस बात को भी सिरे से खारिज कर दिया कि भक्तिकाल का साहित्य किसी रोती हुई या निराश जनता का साहित्य है। उन्होंने कहा:
"भक्ति आंदोलन भारतीय चिंताधारा का स्वाभाविक विकास है। यह कोई हताश मन की पुकार नहीं है। कबीर, सूर या तुलसी के पदों को पढ़कर कहीं से भी यह नहीं लगता कि ये किसी डरी हुई या पराजित जाति के आंसू हैं। इनके भीतर तो अगाध जीवन रस, आत्मविश्वास और लोक-मंगल की प्रचंड शक्ति भरी हुई है।"
— डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
5. अन्य प्रमुख विद्वानों के दृष्टिकोण: किसने क्या माना?
इस विषय पर कुछ अन्य देशी और विदेशी विद्वानों ने भी अपने-अपने चश्मे से देखकर विचार रखे हैं, जो परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं:
(क) जॉर्ज ग्रियर्सन: 'ईसाइयत की देन'
अंग्रेज विद्वान जॉर्ज ग्रियर्सन को जब भारत में ऐसा महान और उदात्त भक्ति साहित्य दिखा, तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि भारतीय लोग खुद इतना महान सोच सकते हैं। उन्होंने इसे ईसा मसीह के प्रेम संदेशों का असर बता दिया।
- ग्रियर्सन ने कहा कि पहली-दूसरी सदी में दक्षिण भारत के समुद्री किनारों पर जो ईसाई मिशनरी आए थे, उन्हीं के प्रेम और दया के उपदेशों से भारत में भक्ति का पौधा पनपा।
- उन्होंने इस अचानक फैले आंदोलन को देखकर लिखा: "यह आंदोलन अचानक उसी तरह बिजली की चमक के समान फैल गया जैसे अंधकार में कोई रोशनी कौंध जाती है।"
- आज आधुनिक साहित्य में ग्रियर्सन के इस 'ईसाइयत वाले मत' को पूरी तरह हास्यास्पद और खारिज माना जाता है, क्योंकि ईसा मसीह के जन्म से सदियों पहले श्वेताश्वतर उपनिषद और भागवत में भक्ति के सूत्र मौजूद थे।
(ख) ताराचंद, हुमायूँ कबीर और आबिद हुसैन: 'इस्लाम का सीधा प्रभाव'
इन इतिहासकारों का मानना था कि इस्लाम के एकेश्वरवाद (एक ही खुदा को मानना) और सामाजिक बराबरी के संदेश ने हिंदू समाज के निचले तबके को बहुत आकर्षित किया। कबीर के यहाँ जो मूर्तिपूजा का विरोध, जाति-पांति का खंडन और एक निराकार ईश्वर की बात मिलती है, वह इस्लाम और सूफी मत के संपर्क का ही सीधा असर था।
(ग) मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा: 'जन-आंदोलन और सामंती व्यवस्था का विरोध'
प्रगतिवादी और मार्क्सवादी आलोचकों ने इसे राजाओं और धर्म के ठेकेदारों की लड़ाई के रूप में देखा।
- गजानन माधव मुक्तिबोध ने कहा कि भक्ति आंदोलन वास्तव में कोई धार्मिक पलायन नहीं था, बल्कि यह उस समय के सामंतवाद (Feudalism) और वर्ण-व्यवस्था के शोषण के खिलाफ आम जनता, किसानों और दस्तकारों का एक बहुत बड़ा सामाजिक और आर्थिक विद्रोह था।
- डॉ. रामविलास शर्मा ने भक्तिकाल को 'लोक जागरण काल' नाम दिया और सिद्ध किया कि यह पूरे भारत की आम जनता का एक सामूहिक जागरण था।
6. दक्षिण से उत्तर भारत तक: भक्ति की यात्रा का ऐतिहासिक सच
साथियों, भारतीय परंपरा में एक बहुत ही प्रसिद्ध दोहा चलता है जो श्रीमद्भागवत महापुराण के पद्मपुराण वाले प्रसंग से जुड़ा है:
"भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लाये रामानंद।
परगट कियो कबीर ने, सप्त द्वीप नव खंड॥"
यह दोहा पूरे इतिहास का नक्शा खींच देता है:
-
उत्पत्ति (दक्षिण भारत): भक्ति का वास्तविक बीजारोपण 6वीं से 9वीं सदी के बीच दक्षिण भारत में हुआ। वहाँ दो तरह के संत थे:
- आलवार संत (संख्या 12): जो भगवान विष्णु और उनके अवतारों के परम भक्त थे। इनमें एकमात्र महिला संत 'आंडाल' (जिन्हें दक्षिण की मीरा कहा जाता है) भी शामिल थीं।
- नयनार संत (संख्या 63): जो देवाधिदेव भगवान शिव के अनन्य उपासक थे।
- दार्शनिक आधार: दक्षिण के महान आचार्यों—रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य और विष्णुस्वामी ने भक्ति को दर्शन और वेदों की ठोस ज़मीन दी।
- उत्तर भारत में आगमन: स्वामी रामानंद इस अमृत रस को दक्षिण से लेकर काशी (उत्तर भारत) आए। उन्होंने जाति-पांति के सारे झूठे बंधनों को तोड़ा और कहा—"जाति पांति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।"
- व्यापक प्रसार: कबीर, रैदास, सेना नाई, पीपा जैसे रामानंद के शिष्यों ने इसे आम जनता के दिलों तक पहुँचा दिया।
7. दोनों मतों का तुलनात्मक अध्ययन (Responsive HTML Table)
नीचे दी गई तालिका को ध्यान से देखिए। यह मोबाइल स्क्रीन पर बहुत ही साफ़ दिखेगी और आपके क्विक रिवीजन के लिए रामबाण साबित होगी:
| विद्वान / आलोचक | भक्तिकाल के उदय का मूल कारण | प्रमुख तर्क / प्रसिद्ध कथन |
|---|---|---|
| आचार्य रामचंद्र शुक्ल | इस्लामी आक्रमण और हिंदू जनता की निराशा | "अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और दया की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?" |
| डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी | भारतीय परंपरा का स्वाभाविक और सांस्कृतिक विकास | "अगर इस्लाम नहीं आया होता, तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।" |
| जॉर्ज ग्रियर्सन | ईसाई धर्म (ईसाइयत) का प्रभाव | "बिजली की चमक के समान अचानक समस्त उत्तर भारत में एक नया विचार फैल गया।" |
| ताराचंद एवं आबिद हुसैन | अरब संस्कृति और इस्लाम का सीधा प्रभाव | एकेश्वरवाद, सामाजिक समानता और सूफी संतों के प्रेम मार्ग का प्रभाव। |
| गजानन माधव मुक्तिबोध | ऐतिहासिक-सामाजिक शक्तियों का संघर्ष | सामंती उत्पीड़न के खिलाफ पीड़ित, शोषित और निम्न वर्ग की जनता का तीव्र विद्रोह। |
| डॉ. रामविलास शर्मा | सामूहिक लोक जागरण | भक्तिकाल को अखिल भारतीय स्तर का 'लोक जागरण काल' माना। |
प्यारे विद्यार्थियों, अगर आप किसी इंटरव्यू (साक्षात्कार) में बैठे हों और बोर्ड आपसे पूछ ले—"आप शुक्ल जी के साथ हैं या द्विवेदी जी के साथ?" तो कभी भी किसी एक तरफ झुककर एकतरफा जवाब मत दीजिएगा। साहित्य में सच हमेशा समन्वय के बीच में होता है। इसका सबसे संतुलित और परिपक्व निष्कर्ष यह है:
- आंतरिक शक्ति (बीज): भक्ति का बीज पूरी तरह से भारतीय परंपरा का स्वाभाविक विकास ही था (जैसा द्विवेदी जी ने कहा)। हमारे उपनिषद, भागवत पुराण, आलवार संत और नाथ-सिद्धों की साधना ही इसकी असली बुनियाद थी।
- बाहरी परिस्थिति (खाद-पानी): उस समय जो तुर्क और मुगल शासन आया, जो सामाजिक उथल-पुथल मची (जैसा शुक्ल जी ने कहा), उसने उस बीज के लिए एक उत्प्रेरक (Catalyst) या खाद-पानी का काम किया। संकट के उस दौर ने जनता को अपनी आंतरिक जड़ों की ओर और अधिक तेज़ी से लौटने पर मजबूर कर दिया।
- अतः हम कह सकते हैं कि भक्ति का प्रवाह हमारे अपने अंतर्मन से फूटा था, लेकिन उस समय के राजनीतिक और सामाजिक तूफानों ने उसके बहाव को और अधिक तेज़, गहरा और जन-व्यापी बना दिया।
📚 Youth Competition Times: विगत वर्षों के महत्वपूर्ण प्रश्न (PYQ Bank)
प्रश्न 1. "लेकिन मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि अगर इस्लाम न आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।" यह प्रसिद्ध कथन किस इतिहासकार का है? [UGC NET Dec 2014, Dec 2018, UPHESC 2021]
(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) डॉ. रामकुमार वर्मा
(C) डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
(D) डॉ. बच्चन सिंह
सही उत्तर: (C)
विस्तृत व्याख्या: डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य की भूमिका' (1940) में आचार्य शुक्ल के निराशावादी दृष्टिकोण का खंडन करते हुए यह बात कही थी।
प्रश्न 2. "अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और दया की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?" यह विचार किसका है? [UP PGT 2016, KVS PGT 2018, RPSC College Lecturer 2020]
(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) बाबू गुलाब राय
(C) जॉर्ज ग्रियर्सन
(D) महावीर प्रसाद द्विवेदी
सही उत्तर: (A)
विस्तृत व्याख्या: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (1929) में भक्तिकाल के राजनीतिक कारणों की पड़ताल करते हुए यह मत व्यक्त किया था।
प्रश्न 3. भक्तिकाल को 'बिजली की चमक के समान अचानक फैल जाने वाला आंदोलन' किसने कहा था? [UGC NET June 2019, DSSSB PGT 2021]
(A) गार्सा द तासी
(B) जॉर्ज ग्रियर्सन
(C) मैक्समूलर
(D) कर्नल जेम्स टॉड
सही उत्तर: (B)
विस्तृत व्याख्या: डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक 'द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान' (1889) में भक्ति के प्रादुर्भाव को ईसाइयत की देन मानते हुए इसे अचानक कौंधने वाली बिजली की चमक के समान विस्मयकारी घटना बताया था।
प्रश्न 4. भक्तिकाल को 'लोक जागरण काल' की संज्ञा किस प्रगतिवादी आलोचक ने दी है? [UGC NET Nov 2020, MPPSC Assistant Professor 2017]
(A) डॉ. नामवर सिंह
(B) गजानन माधव मुक्तिबोध
(C) डॉ. रामविलास शर्मा
(D) शिवदान सिंह चौहान
सही उत्तर: (C)
विस्तृत व्याख्या: मार्क्सवादी आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने अपनी आलोचनात्मक कृतियों में भक्तिकाल को संपूर्ण भारत का एक युगांतरकारी 'लोक जागरण काल' माना है।
साथियों, इस पूरे विश्लेषण को अपनी अध्ययन डायरी में बिंदुवार नोट कर लीजिए। परीक्षा हॉल में जब भी इस टॉपिक से कोई प्रश्न आएगा, तो यकीन मानिए कि आप बिना किसी उलझन के 100% सही विकल्प पर टिक लगाकर आएँगे। अगली क्लास में हम निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य) और कबीरदास के दार्शनिक चिंतन पर इसी तरह खुलकर चर्चा करेंगे। मन लगाकर पढ़िए और अपने लक्ष्य को हासिल कीजिए!

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