कबीरदास का समाज सुधार: आज के दौर में कबीर की प्रासंगिकता
नमस्ते मेरे प्यारे साथियों!
अगर आप UGC NET-JRF, UPSC (हिंदी साहित्य वैकल्पिक) या असिस्टेंट प्रोफेसर की तैयारी में लगे हैं, तो आपने एक बात हमेशा महसूस की होगी। जब भी परीक्षक का मन उम्मीदवार की वैचारिक गहराई, सामाजिक समझ और आलोचनात्मक दृष्टि को परखने का होता है, तो उसका सबसे पसंदीदा ठिकाना बन जाते हैं—कबीरदास।
कबीर केवल 15वीं सदी के एक भक्त कवि नहीं हैं। कबीर असल में हिंदी साहित्य के पहले ऐसे विद्रोही चिंतक हैं जिन्होंने धर्म, जाति, पाखंड और समाज की सड़ी-गली व्यवस्था पर ऐसा हथौड़ा चलाया जिसकी गूंज आज 600 साल बाद भी उतनी ही ताज़ा सुनाई देती है।
अक्सर छात्र मुझसे पूछते हैं कि सर, कबीर को 'भक्त' पहले मानें या 'समाज सुधारक'? शुक्ल जी ने उन्हें क्या समझा? हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने उन्हें 'वाणी का डिक्टेटर' क्यों कह दिया? और सबसे बड़ा सवाल—आज के व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, धार्मिक नफरत और दिखावे के दौर में कबीर हमारे लिए किस तरह एक मशाल का काम करते हैं?
आज की इस विशेष क्लास में हम कबीर के समाज सुधार के हर एक पहलू को बहुत ही सहज, आत्मीय और दोस्ताना लहजे में समझेंगे। अपनी कॉपी और पेन निकाल लीजिए, क्योंकि आज के इस विमर्श के बाद कबीर से जुड़ा कोई भी वैचारिक या तथ्यात्मक प्रश्न आपकी पकड़ से बाहर नहीं जाएगा।
1. कबीर की पृष्ठभूमि: एक जुलाहा जो व्यवस्था के सामने तनकर खड़ा हो गया
साथियों, कबीर को समझने से पहले उस दौर के माहौल को समझना बहुत ज़रूरी है। 15वीं सदी का भारत अंदर और बाहर दोनों तरफ से उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था।
एक तरफ सिकंदर लोदी का राजनीतिक शासन था, जहाँ सत्ता का अहंकार था। दूसरी तरफ भारतीय समाज जातियों के अनगिनत खानों में बंटा हुआ था। छुआछूत अपनी चरम सीमा पर थी। निचली जातियों के लोगों को इंसान तक नहीं समझा जाता था। धर्म का मतलब आत्म-साक्षात्कार नहीं, बल्कि बाहरी कर्मकांड, तिलक, टोपी, माला, रोजा और नमाज बनकर रह गया था।
ऐसे घुटन भरे माहौल में काशी की धरती पर एक ऐसा फकीर खड़ा हुआ, जिसने किसी राजा की चाटुकारिता नहीं की। कबीर ने खुद को कभी पंडित या मौलवी नहीं कहा। वे कहते थे:
"मसि कागद छूयो नहीं, क़लम गह्यो नहिं हाथ।"
सोचिए, जिसने कभी कागज को हाथ नहीं लगाया, स्याही नहीं छुई, उसने बिना पढ़े ही उस समय के सबसे बड़े पंडितों और मौलवियों को शास्त्रार्थ में पानी पिला दिया। कबीर के पास किताबी ज्ञान नहीं था, उनके पास 'आँखों देखी' सच्चाई थी। वे सीधे कहते हैं:
"मैं कहता आँखिन की देखी, तू कहता कागद की लेखी।
मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाई रे॥"
मध्यकाल में भक्ति आंदोलन किन परिस्थितियों में उभरा और इस पर रामचंद्र शुक्ल बनाम हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का क्या मत है, समझें 👉 :- आदिकाल का नामकरण और शुक्ल - द्विवेदी विवाद
2. कबीर का समाज सुधार: पाखंड और आडंबर पर सीधा वार
कबीर का समाज सुधार किसी एक धर्म के खिलाफ नहीं था। यही कबीर की सबसे बड़ी खूबसूरती और ईमानदारी है। वे किसी का पक्ष नहीं लेते। वे 'अक्खड़' थे, 'फक्कड़' थे और सच कहने में किसी के सगे नहीं थे। उन्होंने हिंदू और मुसलमान दोनों के पाखंड पर बराबर की चोट की।
(क) हिंदू रूढ़िवादिता और मूर्तिपूजा पर चोट
उस समय समाज में यह धारणा गहरी थी कि गंगा में डुबकी लगा लेने से, पत्थर की मूरत पूजने से या माथे पर त्रिपुंड लगा लेने से मोक्ष मिल जाता है। कबीर ने इस पर बिना किसी संकोच के व्यंग्य किया। उनका सीधा तर्क था कि अगर पत्थर पूजने से भगवान मिलते, तो मैं पूरे पहाड़ की पूजा करने लगता:
"पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार।
ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार॥"
उन्होंने तीर्थाटन और गंगा स्नान के दिखावे को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि मन के भीतर का मैल धोए बिना शरीर को कितना भी जल में डुबो लो, कोई लाभ नहीं होने वाला:
"नाहै धोये क्या भया, जो मन मैल न जाय।
मीन सदा जल में रहै, धोये बास न जाय॥"
(ख) इस्लामी धर्मांधता और मुल्ला-मौलवियों पर प्रहार
कबीर हिंदू कट्टरता पर जितने कड़े थे, मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने भी उतने ही मुखर थे। उन्होंने मस्जिद पर चढ़कर लाउडस्पीकर (उस समय की बाँग) देने और दिखावे की इबादत पर सवाल उठाया:
"कांकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई चुनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥"
उन्होंने जीव-हिंसा और धर्म के नाम पर पशुओं की बलि देने की प्रवृत्ति को भी सिरे से नकारा। उन्होंने कहा कि दिन भर रोजा रखना और रात को जीव हत्या करके खाना—यह कैसा धर्म है?
"दिन भर रोजा रहत हैं, रात हनत हैं गाय।
यह तो खून वह बंदगी, कैसे खुसी खुदाय॥"
3. जाति-पांति और वर्ण-व्यवस्था का समूल खंडन
प्यारे छात्रों, कबीर के समाज सुधार का सबसे क्रांतिकारी हिस्सा है उनका जाति-विरोधी दृष्टिकोण। कबीर ने उस व्यवस्था की रीढ़ पर वार किया जिसने सदियों से इंसानों को ऊंच-नीच के खांचों में बांट रखा था।
कबीर ने ब्राह्मणवाद के उस अहंकार को खुली चुनौती दी जो जन्म के आधार पर श्रेष्ठता का दावा करता था। उन्होंने ऐसा तीखा सवाल पूछा जिसका जवाब किसी रूढ़िवादी के पास नहीं था:
"जो तूं बाम्हन, बम्हनी का जाया।
आन बाट ह्वै काहे न आया?
जो तूं तुरुक, तुरुकिनी का जाया।
भीतर खतना क्यूं न कराया?"
कबीर का कहना था कि हर इंसान की नसों में एक ही जैसा लाल खून बहता है। जब सृष्टिकर्ता ने सबको एक ही मिट्टी से गढ़ा है, तो कोई ब्राह्मण और कोई शूद्र कैसे हो सकता है?
"एकै पवन एक ही पानी, एकै जोति समाना।
एकै खाक गढ़े सब भांडे, एकै सिरजनहारा॥"
उन्होंने समाज को साफ़ संदेश दिया कि अगर किसी का सम्मान करना है, तो उसके ज्ञान और मानवीय गुणों का करो, उसकी जाति का नहीं:
"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥"
4. प्रमुख आलोचकों के कबीर पर विचार (Exam Point of View)
UGC NET, UPSC और असिस्टेंट प्रोफेसर के पर्चे में आलोचकों के कथनों पर सबसे ज़्यादा सवाल बनते हैं। यहाँ आपको तीन प्रमुख आचार्यों के दृष्टिकोण को बहुत ध्यान से समझना होगा:
1. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत
शुक्ल जी कबीर की समाज सुधारक वाली भूमिका को तो मानते हैं, लेकिन उनके काव्य-कौशल और दार्शनिक चिंतन पर थोड़े संकुचित नज़र आते हैं।
- शुक्ल जी ने माना कि कबीर में प्रतिभा प्रखर थी, लेकिन उनकी भाषा अनगढ़ और बेतरतीब थी।
- शुक्ल जी ने लिखा कि कबीर का ज्ञान अंतर्मुखी साधना का कम और सुनी-सुनाई बातों (उक्ति-वैचित्र्य) का ज़्यादा था।
- डॉ. रामविलास शर्मा: इन्होंने कबीर को सामंतवाद-विरोधी जनचेतना का सबसे बड़ा लोकनायक माना। शर्मा जी के अनुसार कबीर शोषित और वंचित जनता के वास्तविक प्रतिनिधि थे।
- डॉ. बच्चन सिंह: इन्होंने अपने 'हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास' में लिखा: "हिंदी कविता का पहला विद्रोही और क्रांतिकारी कवि कबीर ही है।"
"यद्यपि वे पढ़े-लिखे न थे, पर उनकी प्रतिभा बड़ी प्रखर थी जिससे उनके मुंह से बड़ी चुटीली और व्यंग्यपूर्ण उक्तियां निकलती थीं। इनमें कोई संदेह नहीं कि कबीर ने ठीक मौके पर जनता के उस बड़े भाग को संभाला जो नाथपंथियों के प्रभाव से प्रेम-भाव और भक्ति-रस से शून्य और शुष्क पड़ता जा रहा था।"
— आचार्य रामचंद्र शुक्ल
"भाषा बहुत परिष्कृत और परिमार्जित न होने पर भी कबीर की उक्तियों में कहीं-कहीं विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उनमें बड़ी प्रखर थी, इसमें संदेह नहीं।"
— आचार्य रामचंद्र शुक्ल
2. आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का मत
द्विवेदी जी ने कबीर को हिंदी साहित्य के सर्वोच्च शिखर पर बैठा दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि कबीर केवल कवि नहीं, बल्कि युग-निर्माता थे। द्विवेदी जी का यह कथन परीक्षा में दर्जनों बार पूछा गया है:
"कविता तो कबीर ने केवल साधन के रूप में अपनाई थी, उनका असली लक्ष्य तो मनुष्य को जगाना था। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर (Dictator) थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में भाषा से कहलवा लिया—बन गया तो सीधे-सीधे, नहीं तो दरेरा देकर।"
— डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
द्विवेदी जी ने आगे कबीर के व्यक्तित्व का मूल्यांकन करते हुए लिखा:
"सिर से पैर तक मस्तमौला, स्वभाव से फक्कड़, आदत से अक्खड़, भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचंड, दिल के साफ, दिमाग के दुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से विद्रोही और कर्म से सुधारक—ऐसे थे कबीरदास।"
— डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
3. डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. बच्चन सिंह का दृष्टिकोण
5. आज 21वीं सदी में कबीर की प्रासंगिकता: कबीर आज क्यों ज़रूरी हैं?
साथियों, अक्सर मुख्य परीक्षा (Mains) या इंटरव्यू में यह सवाल पूछा जाता है: "कबीर 600 साल पुराने कवि हैं। आज के डिजिटल युग में, जब हम चांद और मंगल पर पहुंच चुके हैं, कबीर हमारे किस काम के हैं?"
यह बहुत गंभीर प्रश्न है। ज़रा गहराई से सोचिए, क्या आज का समाज कबीर की कुरीतियों से मुक्त हो चुका है? सच तो यह है कि आज कबीर की ज़रूरत 15वीं सदी से भी ज़्यादा है:
(क) सांप्रदायिक सद्भाव और नफरत का इलाज
आज समाज धर्म, जाति और मजहब की दीवारों में पहले से ज़्यादा बंटता जा रहा है। सोशल मीडिया पर धर्म के नाम पर आए दिन नफरत फैलाई जाती है। कबीर आज होते, तो वे दोनों पक्षों को सामने बिठाकर फटकार लगाते। कबीर का 'राम' किसी मंदिर में कैद राम नहीं है, और न उनका 'रहीम' किसी मस्जिद की चारदीवारी का मोहताज है। उनका ईश्वर घट-घट में बसने वाली चेतना है:
"घट घट में वह सांई रमता, कटुक बचन मत बोल रे।"
अगर आज का युवा कबीर के इस आत्मबोध को समझ ले, तो समाज से सांप्रदायिक दंगों और मॉब लिंचिंग जैसी शर्मनाक घटनाएं हमेशा के लिए खत्म हो सकती हैं।
(ख) बाज़ारवाद और अंधाधुंध उपभोक्तावाद पर रोक
आज 21वीं सदी का इंसान डिप्रेशन, तनाव और दिखावे की होड़ में फंसा हुआ है। हर किसी को बड़ी गाड़ी, बड़ा घर और ढेर सारा बैंक बैलेंस चाहिए, चाहे इसके लिए नैतिक मूल्यों की बलि ही क्यों न देनी पड़े। कबीर हमें जीवन जीने का सबसे खूबसूरत न्यूनतम सिद्धांत (Minimalism) सिखाते हैं:
"साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥"
कबीर हमें सिखाते हैं कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है। जब तक मन का लोभ खत्म नहीं होगा, तब तक इंसान को कभी सच्ची शांति नहीं मिल सकती।
(ग) आडंबरमुक्त और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आज भी लोग अंधविश्वास, तांत्रिकों, झूठे बाबाओं और रूढ़ियों के चक्कर में अपनी संपत्ति और सम्मान गंवाते हैं। कबीर हमें सवाल पूछना सिखाते हैं। वे कहते हैं कि किसी बात को इसलिए मत मानो क्योंकि वह किसी पुरानी किताब में लिखी है या किसी धर्मगुरु ने कही है। उसे अपने तर्क और अनुभव की कसौटी पर कसो। कबीर का यह दृष्टिकोण आधुनिक वैज्ञानिक चेतना (Scientific Temperament) के सबसे करीब है।
5.1 कबीर की 'उलटबांसियां': दिमागी जालों को साफ करने का अनोखा तरीका
प्यारे साथियों, कबीर की चर्चा अधूरी रह जाएगी अगर हम उनकी 'उलटबांसियों' की बात न करें। उलटबांसी का मतलब होता है—ऐसी बात जो सीधी नज़र में बिल्कुल उल्टी, असंभव या पहेली जैसी लगे, लेकिन जब उसका तात्विक अर्थ समझ आए तो दिमाग के सारे कपाट खुल जाएं।
कबीर ने योगियों, पंडितों और समाज के ठेकेदारों की बौद्धिक अकड़ तोड़ने के लिए इन उलटबांसियों का खूब इस्तेमाल किया। जैसे उनका यह पद देखिए:
"एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावे गाई।
जल की मछली तरुवर ब्याई, पकरि बिलाई मुरगे खाई॥"
अब कोई सामान्य व्यक्ति इसे पढ़ेगा तो सोचेगा कि कबीर यह क्या पागलों जैसी बात कर रहे हैं कि सिंह गाय को चरा रहा है या बिल्ली को मुर्गा खा रहा है! लेकिन कबीर का प्रतीकात्मक अर्थ समझिए: यहाँ 'गाय' सात्विक ज्ञान या आत्मा है, और 'सिंह' सांसारिक वासना या अहंकार है। कबीर कह रहे हैं कि अज्ञान के वश में होकर वासना आत्मा पर हावी हो गई है। कबीर ने उलटबांसियों के माध्यम से समाज को यह सिखाया कि जो चीज़ जैसी बाहर से दिखती है, ज़रूरी नहीं कि अंदर से भी वैसी ही हो। यह रूढ़ सोच पर तीखा प्रहार था।
5.2 कबीर का नारी संबंधी दृष्टिकोण: क्या कबीर सचमुच नारी-विरोधी थे?
UPSC और असिस्टेंट प्रोफेसर के साक्षात्कारों में यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या कबीर नारी-विरोधी (Misogynist) थे? एक निष्पक्ष शिक्षक के नाते मैं आपको इसका सबसे सच्चा और संतुलित पक्ष समझाता हूँ।
कबीर के साहित्य में कुछ ऐसे दोहे ज़रूर मिलते हैं जहाँ उन्होंने नारी की तीखी आलोचना की है:
"नारी की झांईं परत, अंधा होत भुजंग।
कबीरा तिनकी कौन गति, जे नित नारी संग॥"
ऊपरी तौर पर देखने पर यह बहुत कठोर और नारी-विरोधी लगता है। लेकिन रामचंद्र शुक्ल और हज़ारीप्रसाद द्विवेदी दोनों ने स्पष्ट किया कि कबीर का यह दृष्टिकोण 'नाथपंथियों' के संन्यास-मार्ग के प्रभाव से आया था। कबीर यहाँ पूरी स्त्री जाति का अपमान नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे साधक को 'कामिनी' और 'वासना' के उस आकर्षण से सचेत कर रहे हैं जो ईश्वर-भक्ति के मार्ग में भटकाव पैदा करता है।
कबीर ने जहाँ वासना रूपी स्त्री का विरोध किया, वहीं सती-साध्वी और समर्पित स्त्री की महिमा का ऐसा गान किया जो विरले ही देखने को मिलता है:
"पतिबरता मैली भली, गले कांच की पोत।
सब सखियन में यों दिपै, ज्यों रवि ससि की जोत॥"
अतः कबीर को आधुनिक चश्मे से एकतरफा नारी-विरोधी घोषित करना भूल होगी। उनका मुख्य संघर्ष काम, क्रोध, लोभ और वासना की उस प्रवृत्ति से था जो मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में बाधा बनती है।
कबीर के वैचारिक चिंतन पर सिद्धों और नाथों के हठयोग का कितना गहरा प्रभाव था, इसे विस्तार से जानने के लिए हमारा यह लेख पढ़ें 👉 सिद्ध एवं नाथ साहित्य
6. कबीरदास के प्रमुख तथ्य और आलोचक मत (Responsive HTML Table)
नीचे दी गई तालिका को ध्यान से देखें। यह आपके रिवीज़न और शॉर्ट नोट्स बनाने के लिए सबसे सटीक है:
| प्रमुख विषय / आलोचक | कथन / उपाधि / तथ्य | महत्वपूर्ण परीक्षा बिंदु |
|---|---|---|
| जन्म एवं समकालीन शासक | संवत 1455 (1398 ई.) - काशी | समकालीन: सिकंदर लोदी | सिकंदर लोदी के अत्याचारों और कबीर को जंजीरों में बांधकर गंगा में डुबोने की किंवदंती प्रसिद्ध है। |
| आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी | "वाणी का डिक्टेटर (Dictator)" | द्विवेदी जी ने कबीर को भाषा का तानाशाह माना, जिसने भाषा को मनचाहे रूप में इस्तेमाल किया। |
| आचार्य रामचंद्र शुक्ल | "सधुक्कड़ी भाषा" | शुक्ल जी ने कबीर की भाषा को राजस्थानी, पंजाबी और खड़ी बोली का मिश्रण यानी 'सधुक्कड़ी' कहा। |
| बाबू श्यामसुंदर दास | "पंचमेल खिचड़ी" | कबीर की भाषा में ब्रज, अवधी, भोजपुरी, पंजाबी और फारसी के मिश्रण के कारण यह नाम दिया। |
| मुख्य रचना: 'बीजक' | संकलनकर्ता: धर्मदास (1464 ई.) | तीन अंग: साखी (दोहा छंद/साक्षी), सबद (गेय पद), रमैनी (चौपाई-दोहा/रामायण रूप)। |
| डॉ. बच्चन सिंह | "हिंदी कविता का पहला विद्रोही कवि" | 'हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास' में कबीर को पहला सच्चा विद्रोही स्वीकार किया। |
उस समय काशी के पंडितों ने यह अंधविश्वास फैला रखा था कि जो इंसान काशी में मरता है, उसे सीधे स्वर्ग मिलता है, और जो मगहर (गोरखपुर के पास) में मरता है, वह अगले जन्म में गधा बनता है या नरक में जाता है।
कबीर जब वृद्ध हुए और उनका अंतिम समय निकट आया, तो वे जानबूझकर काशी छोड़कर मगहर चले गए! सोचिए, कितना अदम्य साहस रहा होगा उस फकीर में! उन्होंने समाज को चुनौती देते हुए कहा:
"सकल जनम सिवपुरी गंवाया।मरती बार मगहर उठि आया॥क्या कासी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय जब होई।"
📚 Youth Competition Times: कबीरदास विशेष हल प्रश्न-कोश (PYQ Bank)
प्रश्न 1. "भाषा पर कबीर का ज़बरदस्त अधिकार था, वे वाणी के डिक्टेटर थे।" कबीर के संबंध में यह विचार किस आलोचक का है? [UGC NET Dec 2013, June 2019, MPPSC Assistant Professor 2018]
(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
(C) डॉ. रामविलास शर्मा
(D) बाबू श्यामसुंदर दास
सही उत्तर: (B)
विस्तृत व्याख्या: आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी अत्यंत चर्चित आलोचनात्मक कृति 'कबीर' (1942) में कबीर को 'वाणी का डिक्टेटर' घोषित किया। द्विवेदी जी के अनुसार कबीर भाषा के आगे लाचार नहीं थे, बल्कि भाषा उनके इशारों पर चलती थी।
प्रश्न 2. कबीर की भाषा को 'सधुक्कड़ी' किसने कहा है? [UP PGT 2013, RPSC School Lecturer 2020, DSSSB PGT 2021]
(A) बाबू श्यामसुंदर दास
(B) जॉर्ज ग्रियर्सन
(C) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(D) राहुल सांकृत्यायन
सही उत्तर: (C)
विस्तृत व्याख्या: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (1929) में कबीर की भाषा को 'सधुक्कड़ी' कहा है, क्योंकि इसमें राजस्थानी, पंजाबी और ब्रज-खड़ी बोली की मिली-जुली शब्दावली थी। वहीं, बाबू श्यामसुंदर दास ने कबीर की भाषा को 'पंचमेल खिचड़ी' नाम दिया है।
प्रश्न 3. "तुम जिन जानौ गीत है, यहु निज ब्रह्म विचार।" यह उक्ति किस भक्त कवि की है? [UGC NET June 2015, KVS PGT 2018, UPHESC Assistant Professor 2021]
(A) सूरदास
(B) कबीरदास
(C) तुलसीदास
(D) दादू दयाल
सही उत्तर: (B)
विस्तृत व्याख्या: यह प्रसिद्ध पंक्ति कबीरदास की है। कबीर स्पष्ट करते हैं कि जिसे संसार केवल साधारण 'गीत' या कविता समझ रहा है, वह वास्तव में उनका आत्म-साक्षात्कार और 'परब्रह्म का गंभीर विचार' है।
प्रश्न 4. कबीरदास के गुरु का क्या नाम था और कबीर किस मुगल/दिल्ली सुल्तान के समकालीन थे? [UKPSC Lecturer 2020, UP TGT 2016]
(A) वल्लभाचार्य, बहलोल लोदी
(B) रामानंद, सिकंदर लोदी
(C) राघवानंद, इब्राहिम लोदी
(D) गोरखनाथ, अलाउद्दीन खिलजी
सही उत्तर: (B)
विस्तृत व्याख्या: कबीरदास के गुरु स्वामी रामानंद थे, जिनसे कबीर ने काशी के पंचगंगा घाट पर 'राम' नाम का मंत्र प्राप्त किया था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार कबीर दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी के समकालीन थे।
प्रश्न 5. 'बीजक' में संकलित कबीर की रचनाओं का सही क्रम और विभाजन क्या है? [UGC NET Dec 2018, RPSC College Assistant Professor 2016]
(A) साखी, सबद, रमैनी
(B) सबद, साखी, पद
(C) रमैनी, साखी, मंगल
(D) दोहा, चौपाई, कवित्त
सही उत्तर: (A)
विस्तृत व्याख्या: कबीर के शिष्य धर्मदास ने संवत 1521 (1464 ई.) में कबीर की वाणियों का संकलन 'बीजक' नाम से किया था। इसके तीन प्रमुख भाग हैं: 1. साखी (दोहा छंद में, साक्षी रूप), 2. सबद (गेय पदों में, जो कबीर के दार्शनिक विचार हैं), 3. रमैनी (चौपाई और दोहा छंद में रचित)।

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